मंगलवार, 29 जनवरी 2013

भूतेश्वर महादेव, मथुरा की तस्वीरें

भूतेश्वर महादेव, मथुरा

भूतेश्वर महादेव, मथुरा

भूतेश्वर महादेव, मथुरा

भूतेश्वर महादेव, मथुरा

सोमवार, 28 जनवरी 2013

पथवारी मन्दिर, मथुरा

किसी शुभ कार्य को करने से पूर्व  जहाँ  कुछ लोग सर्वप्रथम गणेश वंदना करते हैं वहीं कुछ लोग पथवारी को भी पूजते हैं। मथुरा स्थित आकाशवाणी के पास बना पथवारी मंदिर भी यूँ  तो कई वर्षो पूर्व का बताया जाता है किन्तु पूर्व की अपेक्षा वर्तमान में यहाँ अधिक श्रद्धालु इस देवी को पूजने आते हैं।

बताते है कि  किसी शुभ कार्य को करने से पूर्व इस देवी की पूजा इसलिए की जाती है कि ताकि उस कार्य को करते समय उस रास्ते (पथ) में कोई अड़चन न आए। यही कारण है कि इस देवी को पथवारी कहा जाता है। अर्थात सही पथ दिखाने के कारण ही यह देवी पूजी जाती है। विभिन्न देवी स्थानों को जाने से पूर्व श्रद्धालु  यहाँ से आज्ञा लेकर ही अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं ताकि यात्रा आसानी से सफल हो जाए।

बताते है कि विवाह, जात आदि कार्यक्रमों में इस देवी को न्यौता दिया जाता है। भूतकाल में इसे महाविध्या  सरस्वती के संगम पर स्थित पथवारी देवी मंदिर इसलिए कहा जाता था क्योंकि सरस्वती कुण्ड व महाविध्या  से निकलने वाले नाले इसी मंदिर के पास आकर मिलते थे।

पथवारी नाम से एक कहानी और जुड़ी हुई है। कहते हैं कि  माँ के अनन्य भक्तों में से एक राजा रूपचन्द थे। एक दिन वह देवी  माँ के साथ  खेल रहे थे तभी माँ का एक अन्य भक्त जो कि नाव चलाते समय डूबने लगा। तभी  माँ से मदद मांगने पर  माँ ने उसकी नैया पार लगा दी किन्तु जब खेलते समय राजा ने देवी के हाथ से जल कीबूँद  गिरती देखी तो पूछ लिया कि यह बूँद  कहाँ  से आयी। तब देवी ने कहा कि कुछ नहीं। तब देवी माँ ने सच्चाई उस राजा को बताई किन्तु राजा ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया और कहा कि  तू झूठ बोल रही है तभी देवी ने क्रोधित होकर उसे पत्थर रूपी बना दिया। जब राजा की पत्नी अपने पति को ढूंढते हुए परेशान हो गई तो देवी ने उसे भी वही बात बताई जो राजा को बताई थी। तब राजा की पत्नी ने कहा मुझे अपना पति वापस चाहिए। तब देवी  माँ ने उससे यह कहा कि मैं तेरे पति को जीवित तो नहीं कर सकती किन्तु तुझे यह वरदान देती हूँ कि आज के बाद मुझसे पहले जो तेरी पूजा करेगा मैं उसकी पूजा स्वीकार कर लूँगी   तभी से सर्वप्रथम पथवारी की पूजा की जाने लगी।

पथवारी मन्दिर, मथुरा
इस मंदिर का जीर्णोद्धार  संवत् 1888 में आगरा  वालों ने कराया था। बताते हैं  कि मथुरा में पहली बार नव कुण्डीय सहस्त्र चण्डी महायज्ञ सन 2002 में इसी मंदिर में हुआ था। इस मंदिर में श्रद्धालु पर्वत धारण किए हुए हनुमान, भैरोनाथ व हाथ में झण्डा लिए लांगुरिया के दर्शन भी कर सकते हैं। वर्तमान समय में ललितामहात्रिपुर सुंदरी मंदिर का भी निर्माण कार्य चल रहा है।

नवरात्रि के दिनों में इस मंदिर पर मेवा, दाल, चावल, सब्जी, फल-फूल आदि के बंगलों  का आयोजन किया जाता है। चैत्र मास की नवरात्रि के तीसरे दिन  यहाँ  आगरा, चौथे व पांचवें दिन मथुरा-हाथरस, छठवें दिन दाऊजी के श्रद्धालु विशेष रूप से आते हैं। नवरात्रि व नववर्ष पर यहाँ   श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। 

चामुण्डा मंदिर, मथुरा

51 शक्तिपीठों में से प्रधान शक्ति पीठ बताई जाने वाली माँ चामुण्डा का मंदिर मथुरा वृंदावन मार्ग स्थित गायत्री तपोभूमि के सामने बना हुआ है।

यह स्थान वह स्थान बताया जाता है  जहाँ  माँ भगवती जगदम्बा के केश गिरे थे। इस मंदिर का वर्णन श्रीमद्भागवत में भी सुनने को मिल जाता है। बताते हैं कि सतयुग के इस मंदिर में श्रीकृष्ण ने अजगर को मुक्ति देने के बाद दर्शन किए थे।

यह मंदिर शाड्लि ऋषि की तपस्थली भी बताई जाती है। कहते हैं कि गुरु गोरखनाथ ने भी इसी मंदिर में सिद्धि प्राप्त की थी।
चामुण्डा मंदिर, मथुरा

इस मंदिर में विराजमान चामुण्डा माँ  नंदबाबा की कुल देवी बताई जाती है। कहते हैं कि नंदबाबा ने ग्वाल-बालों के साथ मिलकर सरस्वती कुण्ड पर श्रीकृष्ण का मुण्डन कराने के बाद इसी चामुण्डा माँ  की जात लगाई थी।

नवरात्रि के प्रत्येक दिनों में यहाँ  श्रद्धालु दर्शन करने के लिए दूर-दराज से आते हैं। प्रत्येक रविवार को व नवरात्रियों की अष्टमी व नवमी के दिन यहाँ श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहता है। अक्षय नवमी व देवोत्थान एकादशी पर्व पर भी  यहाँ भारी मात्रा में श्रद्धालु दर्शन करते हैं क्योंकि इन दिनों लगने वाली मथुरा व तीन वन की परिक्रमा में पडऩे वाले सभी मंदिरों का महत्व बताया जाता है।

खास बात यह है कि इस मंदिर में माँ  चामुण्डा की कोई भी प्रतिमा स्थापित नहीं है बल्कि वह स्वंय उत्पन्न हुई है।

काली माँ मन्दिर, मथुरा

मथुरा में महाविद्या  , चर्चिका, चामुण्डा, कैलादेवी,  बगलामुखी, कात्यायनी,चन्द्रावली  देवियों समेत नौ सिद्धपीठ व मंदिर हैं  पर आज  से लगभग ढाई दशक पहले  यहाँ  काली माँ का मंदिर नहीं था।

संवत् 2015 में मथुरा इलेक्ट्रिक सप्लाई कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर कालीचरन भगत के मन में माई का मंदिर बनाने का भाव जागृत हुआ तो उन्होंने यह बात अपने परम्परागत तीर्थ पुरोहित शिवलोकवासी मंहत मुकुन्दराम नौघर वालों के सामने रखी।

इसके फलस्वरूप गनेश प्रसाद चतुर्वेदी तथा पत्रकार नरेन्द्र मित्र से सलाहकर महाशिवरात्रि पर्व पर वैदिक रीति से माँ भगवती काली की स्थापना उक्त बिजली कम्पनी के पास हो गई जो अब वर्तमान समय में सिद्धपीठ  माँ काली मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है।
काली माँ मन्दिर, मथुरा 

यध्यपि प्रारम्भ में मंदिर के विस्तार एवं भवन निर्माण में कई विघ्र बाधाएं  आईं किन्तु माई के रास्ते में आने वाली बाधाएँ  अवसर में तब्दील होती गई। मंदिर की स्थापना के बाद माई ने ब्रजवासियों पर ऐसी कृपा की कि जिसने जो  माँगा उसे वही मिला। इस कृपा की वर्षा के कारण ही शरदीय नवरात्रि एवं चैत्रमास के नवरात्रि में  यहाँ जूम जुड़ जाता है। यह माई के चमत्कार का ही प्रभाव है कि नवरात्रि के अलावा वर्ष पर्यन्त माई के दरबार में आने वालों का ताँता लगा रहता है।

इस मंदिर की विधिवत स्थापना के हालांकि अभी लगभग 25 वर्ष ही हुए हैं किन्तु माई के चमत्कारों से इसकी मान्यता सैकड़ों वर्ष पुराने मंदिर सी बन गई है। वर्तमान में इस मंदिर का विस्तार कर  यहाँ पर श्री गिरिराज जी, शिव परिवार, वीर हनुमान, भैंरो बाबा तथा क्षेत्रपाल मंदिर की स्थापना की गई किन्तु इस मंदिर की पहचान काली  माँ मंदिर के रूप में ही बनी हुई है।

इस मंदिर पर सन 2013 तक तीन यज्ञों का आयोजन किया जा चुका है जिसमें 2007 में प्रथम पंचकुण्डीय सहस्त्र चण्डी महायज्ञ, 2011 में नवकुण्डीय सहस्त्र चण्डी महायज्ञ तथा वर्तमान सन 2013 में पुन: पंचकुण्डीय सहस्त्र चण्डी महायज्ञ का आयोजन हुआ है। इस बार पंचकुण्डीय महायज्ञ में योनिकुण्ड, चर्तुस्थ कुण्ड, अर्धचंद कुण्ड, पदम कुण्ड, वृत्त कुण्ड बनाए गए थे। इन कुण्डों के अर्थ कुछ इस प्रकार बताए जाते है कि योनि कुण्ड पुत्र प्राप्ति के लिए, चर्तुस्थ कुण्ड सिद्धों के लिए, अर्धचंद कुण्ड शुभफल सुख प्राप्ति के लिए, पदम कुण्ड लक्ष्मी प्राप्ति के लिए तथा वृत्त कुण्ड शान्ति प्राप्ति का प्रतीक होता है।

कंकाली देवी मन्दिर, मथुरा

मथुरा में सिद्धपीठ के नामों में गिनी जाने वाली कंकाली देवी का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर से जुड़ी कथा श्रीकृष्ण के जन्म के साथ जुड़ी है।

बताते है कि कंकाली को पूर्व में कंस काली के नाम से जाना जाता है जिसने कंस को उसके काल से अवगत कराया था। कंकाली योगमाया का ही रूप बताया जाता है।

बताते है कि नंदबाबा व यशोदा के  यहाँ गोकुल में योगमाया (कंकाली) ने तथा मथुरा में वसुदेव व देवकी के पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण ने जन्म लिया  जिन्हें वसुदेव गोकुल लेकर चले गए और  वहाँ से योगमाया को लेकर पुन: मथुरा आ गए।
जब कंस को इस बात का पता चला कि उसका वध करने वाला इस दुनिया में जन्म ले चुका है तो उन्होंने गोकुल से आई योगमाया को जैसे ही मारना  चाहा तो वह उनके हाथ से छिटक कर आकाश में चली गई और उसने यह भविष्यवाणी की थी कि ‘मूर्ख कंस तू मुझे क्या मारेगा, तुझे मारने वाला तो इस ब्रज में जन्म ले चुका है’ इतना कहकर वह योगमाया तीन खण्डों में बिखर गई जो वर्तमान समय में कंकाली मंदिर में   माँ सरस्वती,   माँ काली तथा   माँ लक्ष्मी के  रूप में विराजमान है।
कंकाली देवी मन्दिर, मथुरा

इस मंदिर के पास एक कुण्ड भी स्थित है। बताते तो यह भी है कि इसी स्थान पर कंस ने देवकी की पूर्व में हुई संतानों का वध किया था।

आषाढ़ के चार सोमवारों में लगने वाला  कुँए वाले बाबा का मेला  यहाँ सभी के  आकर्षण का केन्द्र बनता है। हनुमान जयंती सावन के चार सोमवार नवदुर्गा, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी पर भी  यहाँ श्रद्धालु मन्नतें माँगने  के लिए आते हैं।

श्रीकृष्ण की बहन के रूप में प्रसिद्ध कंकाली के इस मंदिर में शीतकाल में प्रात: 6 बजे तथा सांय 6.30 बजे तथा ग्रीष्मकाल में प्रात: 6 बजे और सांय 7.30 बजे आरती का आयोजन किया जाता है।

प्राचीन काल में इस स्थान को कंकाली टीला नाम से जाना जाता था। मंदिर के पास ही एक  कुआँ स्थित है। इस  कुँए का इतिहास भी काफी रोचक बताया जाता है। बताते है कि जाहरवीर ने अपने घरवालों को बिना बताए शादी कर ली जिसके फलस्वरूप उसके घरवालों ने उसे घर से निकाल दिया और उसकी पत्नी को घर में रख लिया किन्तु फिर भी जाहरवीर अपनी पत्नी से चोरी-छिपे मिलने जाता रहता था जिसके कारण उसकी पत्नी के गर्भ ठहर गया। जब इस बात का पता उसकी माँ  को लगा तो उसने उसके बच्चे बुलाखी को अनर्थ बताकर एक  कुँए में फेंक दिया।

यही कारण है कि आषाढ़ के सोमवारों में बच्चों को होने वाली खोर, बच्चों को दवा न लगने आदि समस्याओं से झूझने वाली महिलाएं यहाँआकर  कुँए को पूजती है और प्रार्थना करती है कि यदि  कुँए वाले बाबा उनकी  माँगे सुन ले तो वह उनकी जात अवश्य करेंगी।

कुछ लोग इन्हें शीतला माता के रूप में भी पूजते हैं।

महाविद्या देवी मन्दिर, मथुरा

दसों  विद्याओं में  महाविद्या देवी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। श्रीकृष्ण की कुलदेवी होने के कारण श्रीकृष्ण का मुण्डन भी इसी स्थान पर हुआ था।

श्रीकृष्ण जन्म से पूर्व के इस मंदिर में सरस्वती के स्वरूप में विराजमान महाविद्या  देवी के मंदिर के पास देवकी कुण्ड  स्थित है। इसका इतिहास कुछ इस तरह बताया जाता है कि श्रीधर नामक ब्राह्मण ने अंगिरा ऋषि का अपमान किया था जिसके फलस्वरूप अंगिरा ऋषि ने उसे अजगर होने का श्राप दिया था और कहा था कि त्रेता युग में अम्बिका वन (महाविद्या ) में जाकर तू अपना श्राप भोगेगा।

महाविद्या  देवी मन्दिर, मथुरा

देवकी-वसुदेव ने भी श्रीकृष्ण जन्म से पूर्व  यहाँ आकर मन्नत  माँगी थी कि श्रीकृष्ण का जन्म सकुशल होने पर वह  यहाँ आकर उनका मुण्डन करेंगे। श्रीकृष्ण का जन्म सकुशल होने के बाद देवकी ने पास ही बने कुण्ड में स्नान किया। स्नान करते समय श्रीधर रूपी अजगर ने देवकी का पैर जकड़ लिया। तब श्रीकृष्ण ने उस   साँप से अपनी   माँ को मुक्त कराकर उसका उद्धार किया।

बताते हैं  कि छत्रपति शिवाजी ने भी दिल्ली लूट की योजना इसी स्थान पर बनाई थी और यह मन्नत  माँगी थी कि यदि वह लूट में सफल होते हैं तो  यहाँआकर इस मंदिर का निर्माण कराएंगे।

नव दुर्गा व नर्ववर्ष के समय इस मंदिर में श्रद्धालु अपनी मन्नतें  माँगने के लिए आते हैं। अक्षय नवमी तथा देवोत्थान एकादशी पर लगने वाली परिक्रमा के दिन भी  यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करते हैं।

इस मंदिर में शीतकाल में प्रतिदिन प्रात: 7 बजे व सांय 6.30 बजे तथा ग्रीष्मकाल में प्रात: 6.30 बजे तथा सांय 7.30 बजे आरती का आयोजन किया जाता है। दसों  विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ  विद्या होने के कारण इसे महाविद्या  के नाम से जाना जाता है।

प्राचीन काल में इस मंदिर के पास बने कुण्ड को देवकी कुण्ड के नाम से जाना जाता था जबकि वर्तमान समय में यह कुण्ड  महाविद्या कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है।

रविवार, 27 जनवरी 2013

यमुना-धर्मराज मंदिर, मथुरा

मथुरा के विश्राम घाट पर यम द्वितीया (भैया दूज) के दिन होने वाले स्नान का बहुत महत्व बताया जाता है। कहते हैं कि इस दिन जो भाई बहन  यहाँ आकर यमुना में स्नान करते हैं वह यमलोक से मुक्त हो जाते हैं।

विश्राम घाट पर स्थित यमुना धर्मराज के मंदिर का इतिहास भी इसी स्नान से जुड़ा है। भारत में भाई-बहन के नाम से प्रसिद्ध यह एक  मात्र ऐसा मंदिर है जहाँ आकर भाई-बहन अपनी मनोकामना माँगते  हैं।

बताते हैं कि सूर्य नारायण व संध्या की संतान यम-यमी दोनों भाई-बहन हैं । यमी अर्थात् यमुना ने सतयुग में नारायण की तपस्या की तब नारायण ने प्रसन्न होकर उनसे कहा कि मैं द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित होकर तेरा वरण करूँगा । यही कारण है कि श्रीकृष्ण को जब वसुदेव गोकुल ले जा रहे थे तभी रास्ते में यमुना जी ने अपने पति अर्थात् श्रीकृष्ण के चरण स्पर्श करने के बाद उन्हें रास्ता दे दिया। यही कारण है कि यमुना जी श्रीकृष्ण की पटरानी के रूप में जानी जाती है।
यमुना-धर्मराज मंदिर, मथुरा 

यमुना जी द्वारा अपने भाई धर्मराज को अपने यहाँ  बुलाने का निमंत्रण दिया जाता है। संयोग वश  दीपावली के बाद आने वाली दौज के दिन धर्मराज अपनी बहन से मिलने आते हैं। यमुना बहन अपने भाई धर्मराज का टीका कने के पश्चात उन्हें छप्पन भोग ग्रहण कराती हैं। अपनी बहन के आतिथ्य से प्रसन्न होकर धर्मराज उन्हें वर माँगने  को कहते हैं तब यमुना जी कहती  हैं कि मैं तीनों लोकों को देने वाले श्रीकृष्ण की पटरानी हूँ वहीं मेरे सर्वज्ञ हैं  , मुझे अब और किसी चीज की चाह नहीं है। यह सुनकर धर्मराज कहते हैं कि बहन अगर तूने मुझसे कोई वर नहीं  माँगा तो तेरे भाई का मान कम हो जाएगा। तब यमुना जी यह वर  माँगती हैं  कि अगर वर देना ही है तो यह वर दो कि आज के दिन अर्थात् यम द्वितीया (भैया दूज) पर्व पर जो भी भाई-बहन हाथ पकड़ कर विश्राम घाट पर मेरे अंदर स्नान करके इस मंदिर के दर्शन करेंगे वह मृत्यु के पश्चात यमलोक को नहीं जाए।

यमुना जी द्वारा  माँगे गए इस वरदान को धर्मराज सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। यही कारण है कि प्रतिवर्ष द्वितीया (भैयादूज) पर्व के दिन लाखों श्रद्धालु विश्राम घाट पर स्नान करने के पश्चात इस मंदिर के दर्शन करते हैं।

विश्राम घाट, मथुरा

मथुरा में पूर्ण तीर्थ के रूप में स्थित विश्राम घाट का इतिहास वैसे तो काफी पुराना बताया जाता है किन्तु यदि इसकी वास्तविकता पर गहनता से प्रकाश डाला जाए तो इसके इतिहास से जुड़ी कहानी काफी रोचक प्रतीत होती है।

बताते  हैं कि जब मधु-कैटभ व हिरण्याकश्यप आदि राक्षस पृथ्वी को पाताल में ले गए थे तब वराह भगवान ने अवतरित होकर पृथ्वी को उन राक्षसों से मुक्त कराया था। इस घटना के बाद उन्होंने  यहीं अर्थात विश्राम घाट पर आकर आराम किया था तभी से इस घाट को विश्राम घाट के नाम से जाना जाने लगा।

मामा कंस का वध करने के बाद श्रीकृष्ण व बलराम ने भी  यहीं आकर विश्राम किया था इसलिए भी इसे विश्राम घाट के नाम से पहचाना जाता है।
विश्राम घाट, मथुरा

यह स्थल वह स्थान भी बताया जाता है जब वसुदेव श्रीकृष्ण को गोकुल ले जा रहे थे तब यहीं श्रीकृष्ण की पटरानी यमुना ने उनके चरण स्पर्श किए थे।

इसी स्थान पर यमुना जी ने अपने भाई धर्मराज से यह वरदान  माँगा था कि  यम द्वितीया के दिन यमुना जी में जो कोई भी भाई-बहन स्नान करेगा वह यम की फांस से मुक्त हो जाएगा।  यही कारण है कि प्रतिवर्ष यमद्वितीया के दिन लाखों की संख्या में विदेशी व देशी भाई-बहन  यहाँ आकर स्नान करते हैं 

कृष्णों नृशंस परिहत्य कंस, विश्रान्तवान् रामयुतो यतोत्व।
स्थान तोत्दोत्भत प्रसिद्धि, विश्रंति तीर्था भिघया धरायाम्।।
अर्थात - श्रीकृष्ण ने  परायों की पीड़ा हरने के लिए नृसिंह का सा रूप धारण कर कंस का वध किया। वध करने के बाद दोनों भाईयों (बलराम व श्रीकृष्ण) ने  यहींआकर विश्राम किया। तभी से यह स्थान विश्राम घाट के नाम से प्रसिद्ध है। उक्त श्लोक वर्तमान समय में भी इस घाट पर देखने को मिल जाता है।

84 कोस की परिक्रमा भी इसी स्थान से होकर गुजरती है। यमुना का तीर्थ भी विश्राम घाट ही बताया जाता है। इस स्थान पर ग्रीष्मकाल में प्रतिदिन प्रात: 5 बजे तथा सांय 7 बजे व शीतकाल में प्रतिदिन प्रात: 5.30 बजे व सांय 7.30 बजे आरती का आयोजन किया जाता है।
विश्राम घाट, मथुरा

विश्राम घाट पर वह स्थान भी बना हुआ है  जहाँ मृत्यु के पश्चात् लोगों को विश्राम दिया जाता है तत्पश्चात् उन्हें अंत्येष्टि के लिए ले जाया जाता है।

वैसे तो (भैया दूज) यम द्वितीया पर्व, श्रावण मास व अधिक मास में  यहाँ श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है किंतु वर्ष में भक्तों द्वारा कराए गए चुनरी मनोरथ व छप्पन भोग इत्यादि के आयोजनों के समय भी  यहाँ अच्छा-खासा भीड़ का नजारा देखने को मिल जाता है। इस स्थान पर भक्त यमुना जी, श्रीकृष्ण-बलराम, राधा-माधव, कुपजा श्रीकृष्ण, यमुना-धर्मराज, महाप्रभु की बैठक आदि मंदिरों के दर्शन भी कर सकते हैं।

भूतेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास

मथुरा में स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास वैसे तो बहुत पुराना है किन्तु इसका इतिहास पता लगाने के लिए अनेक कथाएं सुनने  को मिल जाती है। एक ऐसी ही कथा द्वापर युग में जन्मे श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है।

जब श्रीकृष्ण का जन्म होता है और उन्हें मथुरा से गोकुल ले जाया जाता है तो  वहाँ भोलेनाथ (शिवजी) श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए  पहुँचते हैं । भोलेनाथ का साधुवेशधारी रूप देखकर यशोदा उन्हें यह कह देती  हैं कि तू चाहे कितना भी हठ कर ले मैं तुझे अपने लाला  के दर्शन नहीं कराऊंगी। तू इस समय इतना भयानक लग रहा है कि तुझे देखकर मेरा लाला श्रीकृष्ण डर जाएगा क्योंकि वह अभी छोटा है। इतना सुनते ही भोलेनाथ वहाँ से तो चले जाते हैं किन्तु वह पास ही के वर के पेड़ के नीचे भजन करने बैठ जाते हैं। वहीं दूसरी ओर श्रीकृष्ण रोने लगते हैं तो यशोदा घबराकर अपने आसपास की सखियों को बुला लेती हैं  और उन्हें इस घटना से अवगत कराती हैं  कि एक साधु आया था जो लाला के दर्शन करने की कह रहा था। मेरे मना करने पर वह साधु तो चला गया किन्तु लाला तभी से रो रहा है। इतना सुनते ही यशोदा की सखियों ने आसपास के क्षेत्रों में भोलेनाथ की तलाश शुरु कर दी जिन्हें कुछ क्षण बाद ही पास में बैठे भोलेनाथ भजन करते दिखाई दे गए। उन्होंने भोलेनाथ से कहा कि हमारे लाला को नजर लग गई है तुम चलकर उसकी नजर उतार दो। सखियों द्वारा काफी मनाने के बाद भोलेनाथ दर्शन करने के लिए पहुंच गए जिन्होंने श्रीकृष्ण के तारण मंत्र की विभूति जैसे ही लगाई श्रीकृष्ण तत्काल ही मुस्करा गए तब यशोदा ने कहा कि बाबा तू  यहीं रुक जा और यदि  कभी मेरे लाला को नजर लग जाए तो तू उसे उतार दिया करियौ। भोलेनाथ बोले कि यदि भविष्य में कभी ऐसा हो तो तू उसे मथुरा के भूतेश्वर महादेव पर ले अइयौ मैं  वहीं विराजमान रहता हूँ । इतना कहकर ही भोलेनाथ वहाँ  से आकर यहाँ भूतेश्वर नामक स्थान पर विराजमान हो गए।

भूतेश्वर महादेव के इस मंदिर में उस  माँ उमा शक्ति पीठ का मंदिर भी स्थापित है  जहाँ शक्ति जी के केश गिरे थे। इसलिए इसे भूतेश भैरव भी कहा जाता है।

इस मंदिर में श्रद्धालु राज राजेश्वर महादेव, शनिदेव आदि मंदिरों के दर्शन भी कर सकते हैं। श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण  होने के कारण यहाँ प्रतिदिन आस्थावान लोगों का सैलाब उमड़ता है।

भूतेश्वर महादेव मंदिर, मथुरा


जहाँ  एक ओर ब्रज में चार महादेव प्रसिद्ध  हैं जिसमें मथुरा में भूतेश्वर, कामां में कामेश्वर, गोवर्धन में चक्लेश्वर व वृंदावन में गोपेश्वर माने जाते हैं। वहीं दूसरी ओर मथुरा शहर में भी चार महादेव प्रसिद्ध हैं जिसमें पश्चिम में भूतेश्वर, पूर्व में पीपलेश्वर, उत्तर में गोकरननाथ तथा दक्षिण में रंगेश्वर का मंदिर स्थित है।

पश्चिम में स्थित भूतेश्वर महादेव को आत्मा अर्थात भूतों का ईश्वर बताया जाता है। मंदिर के इतिहास के बारे में यूँ तो कई कहानियों के रूप में इसका वर्णन किया जाता है किन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार इतिहास को इस प्रकार भी बताया जाता है।

मधु व कैटभ नाम के दो दानव जन्म लेने के बाद भगवान विष्णु की नाभि से कमल पर चढ़ जाते हैं  जहाँ पर ब्रह्मा जी भजन में लीन रहते हैं। वह दोनों उनके भजन को भंग करते हुए उनको परेशान करने लगते हैं। ब्रह्मा जी द्वारा उनको कोई जबाव न मिलने पर वह ब्रह्मा जी को मारने को उतारु हो जाते हैं। बचाव में ब्रह्मा जी द्वारा चिल्लाने पर वहाँ  पहुँचे  विष्णु का युद्ध दानवों से हो जाता है। काफी समय युद्ध चलने के बाद भी उसका कोई निष्कर्ष न निकलने के कारण विष्णु प्रसन्न होकर कैटभ को वरदान देने की बात कहते हैं जिसे कैटभ स्वीकार न करके यह कह देता है कि तुम अभी युद्ध जीते नहीं हो इसलिए तुम्हारा वरदान देने का कोई अधिकार नहीं है। वह इसके विपरीत स्वंय विष्णु को वरदान देने की बात कहते हैं। वरदान की बात सुनकर विष्णु कैटभ से यह कह देते हैं कि तुम जिस इष्ट देव को मानते हो यदि तुम उस देव की तीन बार शपथ ले लो तो वह वरदान लेने को तैयार है। कैटभ द्वारा अपने इष्ट देव अर्थात शिव जी की तीन बार शपथ लेने के बाद विष्णु हाथ पसार कर कैटभ से अपना शीष काटकर देने की बात कहते हैं। मधु के आ जाने के बाद कैटभ कहता है कि भैया यदि अब हम युद्ध करेंगे तो हार जायेंगे  क्योंकि मैंने भगवान शिव की शपथ खाकर इन्हें शीष काटकर देने का वचन दिया है और मुझे विश्वास है कि तुम बाद में मेरा बदला जरुर पूरा करोगे। इसी कारण मधु ने इस स्थान पर आकर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न हुए शिवजी ने मधु को एक वरदान  माँगने को कहा मधु ने एक वरदान स्वीकार न करते हुए तीन वरदान माँगने की बात कहीं जिसे सुन शिवजी अन्तरध्यान हो गए। इसके बाद भी जब मधु अपनी तपस्या में लीन रहा तभी कैलाश पर्वत उसकी तपस्या के बल से हिलने लगा जिसे देखकर भगवान शिव ने कहा कि मैं तुम्हारे तीन वरदान देने के लिए तैयार हूँ  इसके अतिरिक्त मैं तुम्हें चौथा वरदान भी दूँगा। मधु द्वारा  माँगे गए वरदानों में प्रथम वरदान के रूप में यह बताया जाता है कि मधु का कहना था कि जिस विष्णु ने उनके भाई को छल  से मारा था वो  यहाँ का राजा बने, दूसरा वरदान यह था कि जिस ब्रह्मा ने सब कुछ पता होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं बताया इसलिए वह चोर बने। तीसरा वरदान के रूप में उन्होंने शिवजी से यह  माँगा था कि वह संहार कर्ता के स्थान पर पालनकर्ता और रक्षा करने वाले बने। स्वंय अपनी ओर से शिवजी ने मधु को चौथे वरदान के रूप में त्रिशूल देते हुए कहा कि तीन लोक और चौदह वनों में कोई तब तक नहीं हरा पाएगा जब तक तुम्हारे हाथ में यह त्रिशूल रहेगा।
भूतेश्वर महादेव मंदिर, मथुरा

तभी से इसको आत्माओं का ईश्वर अर्थात भूतेश्वर नाम दिया गया। भूतेश्वर महादेव मंदिर पर एक आश्चर्य की बात यह भी देखने को मिलती है कि इस महादेव का  मुँह खुला हुआ है। यह महादेव राक्षसों के आराध्य देव माने जाते हैं। इस मंदिर की प्राचीनता का पता लगाना काफी कठिन है।

भूतेश्वर कोतवाल  यहाँ  के, केशव की ठुकराई है।
तीन लोक से न्यारी-प्यारी, भारी मधुपुरी बेदंगाई है।।

इस मंदिर में सावन के सोमवार, महाशिवरात्रि, नववर्ष, सावन की तीज व जन्माष्टमी पर्वो पर विशेष आयोजन किया जाता है। सावन के महीने में कांवडिय़ों द्वारा लाया गया जल इस शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। सावन में जेहर चढ़ाने आदि की परम्परा भी इस मंदिर से जुड़ी हुई है।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर विवाद


श्रीकृष्ण जन्म स्थान होने के कारण मथुरा स्थित जन्मभूमि वैसे तो देशी व विदेशी दोनों ही प्रकार के श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र रही है किन्तु विदेशी लोगों के अलावा कई देशी लोग भी इस बात से अभी तक अनभिज्ञ हैं कि जिस जन्मभूमि का दर्शन वह श्रीकृष्ण जन्मस्थान के रूप में कर रहे वह वास्तव में जन्मस्थान है भी या नहीं।

वर्तमान समय में जिस कारागार को कंस कारागार की संज्ञा दी जा रही है वह वास्तव में कंस कारागार नहीं है। यह कारागार 1962 में  बनी थी जो अब श्रीकृष्ण जन्मस्थान के नाम से प्रसिद्ध है।

वर्तमान समय में जिस भागवत भवन में श्रीकृष्ण का जन्म होता है वह मात्र 28 वर्ष पुरानी अर्थात 1984 में बना था जबकि जन्मस्थान के बाएं ओर बना कारागार ही वह कारागार है  जहाँ देवकी और वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। वर्तमान समय में भी इस मंदिर में देवकी और वसुदेव की प्राचीन मूर्ति आज भी स्थापित है।

वैकल्पिक  श्रीकृष्ण जन्म स्थान मंदिर 
इस मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व सप्तमी की रात्रि अर्थात अष्टमी में ही किया जाता है। इस मंदिर में आज भी वह स्थान स्थापित है जहाँ  चैतन्य महाप्रभु जैसे विद्वानों ने आकर अपनी शक्ति व बल प्रयोग से इस स्थान का पता लगाने के लिए भजन किया था।

इस मंदिर में श्रद्धालुओं को उस स्थान के दर्शन भी आसानी से मिल सकते हैं जिस स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण का नार गाढ़ा गया था।  जन्मस्थान में दर्शन करने के लिए आने वाले काफी श्रद्धालुओं के लिए अभी यह मंदिर उनकी पहचान के बाहर मात्र इसलिए है क्योंकि इस मंदिर की उपेक्षा के लिए पास में ही नव जन्मस्थान का निर्माण हो चुका है।

इस मंदिर में उस योगमाया का मंदिर भी स्थापित है जो नंदबाबा और यशोदा की पुत्री थी जिसने कंस के हाथ से फिसलकर आसमान से कंस के मरने की आकाशवाणी की थी।

प्राचीन केशवदेव मंदिर, मथुरा

श्रीकृष्ण जन्मस्थान के निकट बना प्राचीन केशवदेव मंदिर यूं तो विश्व पटल पर कई मायनों में प्रसिद्ध है किन्तु कुछ वर्षो पूर्व ही श्रीकृष्ण जन्मस्थान में हुए नये केशवदेव मंदिर के निर्माण से इस पुराने केशवदेव मंदिर की प्रसिद्धी लुप्त होती जा रही है।

बताते है कि वर्तमान समय में जहां ईदगाह बनी हुई है वहां 1669 में मुस्लिम राज के समय में केशवदेव का मंदिर बना हुआ था जिसे औरंगजेब द्वारा तोडक़र ईदगाह के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। उसी समय मराठा सिंधिया ने इस मंदिर की स्थापना पोतराकुण्ड के निकट केशवदेव मंदिर के रूप में की थी। यह मंदिर मल्लपुरा में स्थित है। कंस के मल्लों का निवास स्थान होने के कारण इसे मल्लपुरा की संज्ञा दी गई।

इस मंदिर में वैसे तो वर्ष पर्यन्त पडऩे वाले सभी पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं किन्तु बंसत पंचमी पर लगने वाले छप्पन भोग इस मंदिर को अनोखी छटा प्रदान करते है। इस दिन लाखों श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन करते है। विदेशी भक्तों के लिए रंग भरनी एकादशी पर गताश्रम विश्राम घाट से निकलने वाली ठाकुर केशव देव की सवारी मुख्य आकर्षक का केन्द्र बनती है जो मल्लपुरा स्थित केशवदेव मंदिर पहुंचकर सम्पन्न होती है। छोटी दीपावली अर्थात नरक चौदस के दिन इस मंदिर में दीपोत्सव का आयोजन भी किया जाता है।
 प्राचीन केशवदेव मंदिर, मथुरा
यूं तो साल के 365 दिनों में से 364 दिनों में ठा. केशवदेव देव का चतुभुजी रूप में दर्शन किया जाता सकता है किन्तु यदि आपको ठा. केशवदेव के चौबीस अवतारों के दर्शन करने हो तो आप केवल अक्षय तीज पर ही उनके दर्शन कर सकते हैं। इस दिन भी लोगों में दर्शन करने की होड़ लगी रहती है।

कुछ लोगों के लिए एक आश्चर्य की बात यह भी है कि पूरे विश्व में जन्माष्टमी पर्व अष्टमी की रात्रि को अर्थात नवमी को मनाया जाता है किन्तु श्रीकृष्ण के जन्मस्थान अर्थात मल्लपुरा के निवासी श्रीकृष्ण का जन्म सप्तमी की रात्रि को अर्थात अष्टमी में मनाते है।

केशवदेव मंदिर के निकट बना पोतरा कुण्ड इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहां श्रीकृष्ण के गोकुल जाने के बाद मथुरावासियों ने उनके शुद्धि स्नान के लिए इस कुण्ड का प्रयोग किया था।

रंगेश्वर महादेव मंदिर, मथुरा

मथुरा शहर की चारों दिशाओं में स्थित चार महादेवों में से एक महादेव दक्षिण दिशा में भी स्थित है जिसे रंगेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

लगभग 5500 वर्ष पुराने प्राचीन इस मंदिर का इतिहास यह बताया जाता है कि कंस का वध करने के बाद श्रीकृष्ण व बलराम में झगड़ा हुआ था। झगड़े का कारण यह बताया जाता है कि श्रीकृष्ण का कहना था कि कंस का वध उन्होंने किया है जबकि बलराम का कहना था कि कंस को उन्होंने मारा है। दोनों भाइयों में झगड़ा होते देख पाताल से शिवजी प्रगट हुए उन्होंने न्याय करते हुए कहा कि तुम दोनों भाइयों का रंग है। कृष्ण तुम छलिया हो तुमने छल से तथा बलराम तुम बलिया हो तुमने बल से कंस का वध किया है अर्थात तुम दोनों ने ही कंस का वध किया है।

इतना कहकर जब शंकर भगवान चलने लगे तो दोनों भाई हाथ जोडक़र यह कहने लगे कि प्रभु आपने जिस प्रकार हम दोनों भाइयों का न्याय कराया है उसी प्रकार आज से आपका नाम रंगेश्वर महादेव के नाम से जाना जाएगा। तभी से लेकर आज तक इस महादेव की पूजा रंगेश्वर महादेव के रूप में की जा रही है।

रंगेश्वर महादेव, मथुरा


इस मंदिर में काली माता, राम-जानकी, शनिदेव, सत्यनारायण, हनुमान आदि के मंदिर भी स्थापित है। इस मंदिर में सावन के प्रत्येक सोमवार में श्रद्धालु का भारी सैलाब उमड़ता है। अक्षय तीज पर लगने वाली मथुरा की परिक्रमा के दिन भी यह मंदिर परिक्रमार्थियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

महाशिव रात्रि के पर्व पर इस मंदिर में विशेष पूजा की जाती है। यह मंदिर भी कांवडिय़ों के जल चढ़ाने के प्रमुख स्थानों में से एक है। सावन के प्रत्येक सोमवार पर इस मंदिर में विभिन्न बंगलों जैसे फूल, बर्फ आदि के दर्शन किए जा सकते हैं।

गोकरननाथ महादेव, मथुरा की तस्वीरें


 चन्दन श्रृंगार, गोकरननाथ महादेव, मथुरा 

 गोकरननाथ महादेव, मथुरा

सूखे मेवे का श्रृंगार, गोकरननाथ महादेव, मथुरा

  मुर्दे की भस्म का श्रृंगार, गोकरननाथ महादेव, मथुरा

गोकरननाथ महादेव मंदिर, मथुरा के बारे में पढ़ें


गोकरननाथ महादेव मंदिर, मथुरा

मथुरा शहर की चारों दिशाओं में शिवजी के मंदिर होने के कारण उन्हें मथुरा का कोतवाल कहा जाता है। उन्हीं में से एक उत्तर में स्थित गोकरननाथ महादेव का मंदिर भी है। आकाशवाणी के पास स्थित यह मंदिर लगभग 6 हजार वर्ष पुराना बताया जाता है।

मंदिर की प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में यह बात अत्यधिक प्रचलन में है कि कंस को मारने से पूर्व श्रीकृष्ण ने इस मंदिर के दर्शन करने के बाद अपनी गायों को यहीं गोकरननाथ महादेव के सुपुर्द किया था। इस मंदिर का महत्व और अधिक इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि संतान प्राप्ति के लिए महिलाएं यहां आकर मन्नतें मांगती है। इसी कारण इसे सिद्ध पीठ की संज्ञा भी दी गई है।

स्थापना के विषय में बताया जाता है कि आत्म देव की पत्नी धुंधली जिनके कोई संतान नहीं थी जिन्हें संतान प्राप्ति के लिए एक ऋषि ने एक फल दिया था किन्तु धुंधली ने उस फल का स्वंय पान न करके उसे अपनी गाय को खिला दिया जिसके कारण उस गाय के कान से पैदा हुए परम ज्ञानी का नाम गोकरननाथ रखा गया। संतान की चाह में धुंधली ने अपनी बहन के पुत्र धुंधकारी को गोद ले लिया। धुंधकारी की बुद्धि विपरीत होने के कारण उसे अकाल मृत्यु के बाद प्रेत योनि की प्राप्ति हुई जिस कारण धुंधकारी की भटकती आत्मा मुक्ति के लिए गोकरननाथ के पास गई। धुंधकारी को मुक्ति दिलाने के लिए गोकरननाथ ने हरे-कच्चे व सात गांठ वाले बांस को गाढक़र सात दिन भागवत पड़ी जिससे प्रत्येक दिन उस बांस की एक-एक गांठ फटती गई और सातवें दिन आखिरी गांठ फटते ही धुंधकारी को मुक्ति मिल गई तत्पश्चात गोकरननाथ द्वारा की गई शिवजी की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वंय शिवजी ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि कलियुग में आप महादेव के रूप में पूजे जाएंगे। यही कारण है कि कलियुग में गोकरननाथ की पूजा महादेव के रूप में की जा रही है।

गोकरननाथ महादेव, मथुरा

बताते तो यह भी है कि कंस को मारने के बाद श्रीकृष्ण द्वारा मथुरा की परिक्रमा लगाई गई जिसमें उन्होंने चारों महादेव के दर्शन भी किए गए।

बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यूं तो सावन के सभी सोमवार मुख्य होते हैं किन्तु सावन के आखिरी सोमवार के दिन गोकरननाथ महादेव का मुर्दे की भस्म से किया गया श्रंगार मुख्य आकर्षक का केन्द्र बनता है। अन्य सोमवारों तथा शिवरात्रि के पर्व पर श्रद्धालु मेवा, फूल, चंदन आदि के श्रंगार के दर्शन भी यहां कर सकते हैं। सावन के सोमवारों के दिनों में कांवडिय़ों द्वारा लाया गया गंगाजल भी इस शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। सावन के ही सोमवार में सुहागिनें इस मंदिर पर जेहर चढ़ाती है। इस मंदिर में गोवर्धन पर्व पर भी विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

इस मंदिर में गोकरननाथ महादेव की मूर्ति है जिसका बांया हाथ लिंग तथा दांया हाथ हृदय पर है जिसका अर्थ यह बताया जाता है कि मनुष्य के अंदर दो चीजें चलायमान होती है जिन्हें गोकरननाथ ने अपने बस में कर रखा है। उन दो चीजों की संज्ञा काम और क्रोध को दी गई है।

गोकरननाथ महादेव, मथुरा की तस्वीरें