सोमवार, 28 जनवरी 2013

पथवारी मन्दिर, मथुरा

किसी शुभ कार्य को करने से पूर्व  जहाँ  कुछ लोग सर्वप्रथम गणेश वंदना करते हैं वहीं कुछ लोग पथवारी को भी पूजते हैं। मथुरा स्थित आकाशवाणी के पास बना पथवारी मंदिर भी यूँ  तो कई वर्षो पूर्व का बताया जाता है किन्तु पूर्व की अपेक्षा वर्तमान में यहाँ अधिक श्रद्धालु इस देवी को पूजने आते हैं।

बताते है कि  किसी शुभ कार्य को करने से पूर्व इस देवी की पूजा इसलिए की जाती है कि ताकि उस कार्य को करते समय उस रास्ते (पथ) में कोई अड़चन न आए। यही कारण है कि इस देवी को पथवारी कहा जाता है। अर्थात सही पथ दिखाने के कारण ही यह देवी पूजी जाती है। विभिन्न देवी स्थानों को जाने से पूर्व श्रद्धालु  यहाँ से आज्ञा लेकर ही अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं ताकि यात्रा आसानी से सफल हो जाए।

बताते है कि विवाह, जात आदि कार्यक्रमों में इस देवी को न्यौता दिया जाता है। भूतकाल में इसे महाविध्या  सरस्वती के संगम पर स्थित पथवारी देवी मंदिर इसलिए कहा जाता था क्योंकि सरस्वती कुण्ड व महाविध्या  से निकलने वाले नाले इसी मंदिर के पास आकर मिलते थे।

पथवारी नाम से एक कहानी और जुड़ी हुई है। कहते हैं कि  माँ के अनन्य भक्तों में से एक राजा रूपचन्द थे। एक दिन वह देवी  माँ के साथ  खेल रहे थे तभी माँ का एक अन्य भक्त जो कि नाव चलाते समय डूबने लगा। तभी  माँ से मदद मांगने पर  माँ ने उसकी नैया पार लगा दी किन्तु जब खेलते समय राजा ने देवी के हाथ से जल कीबूँद  गिरती देखी तो पूछ लिया कि यह बूँद  कहाँ  से आयी। तब देवी ने कहा कि कुछ नहीं। तब देवी माँ ने सच्चाई उस राजा को बताई किन्तु राजा ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया और कहा कि  तू झूठ बोल रही है तभी देवी ने क्रोधित होकर उसे पत्थर रूपी बना दिया। जब राजा की पत्नी अपने पति को ढूंढते हुए परेशान हो गई तो देवी ने उसे भी वही बात बताई जो राजा को बताई थी। तब राजा की पत्नी ने कहा मुझे अपना पति वापस चाहिए। तब देवी  माँ ने उससे यह कहा कि मैं तेरे पति को जीवित तो नहीं कर सकती किन्तु तुझे यह वरदान देती हूँ कि आज के बाद मुझसे पहले जो तेरी पूजा करेगा मैं उसकी पूजा स्वीकार कर लूँगी   तभी से सर्वप्रथम पथवारी की पूजा की जाने लगी।

पथवारी मन्दिर, मथुरा
इस मंदिर का जीर्णोद्धार  संवत् 1888 में आगरा  वालों ने कराया था। बताते हैं  कि मथुरा में पहली बार नव कुण्डीय सहस्त्र चण्डी महायज्ञ सन 2002 में इसी मंदिर में हुआ था। इस मंदिर में श्रद्धालु पर्वत धारण किए हुए हनुमान, भैरोनाथ व हाथ में झण्डा लिए लांगुरिया के दर्शन भी कर सकते हैं। वर्तमान समय में ललितामहात्रिपुर सुंदरी मंदिर का भी निर्माण कार्य चल रहा है।

नवरात्रि के दिनों में इस मंदिर पर मेवा, दाल, चावल, सब्जी, फल-फूल आदि के बंगलों  का आयोजन किया जाता है। चैत्र मास की नवरात्रि के तीसरे दिन  यहाँ  आगरा, चौथे व पांचवें दिन मथुरा-हाथरस, छठवें दिन दाऊजी के श्रद्धालु विशेष रूप से आते हैं। नवरात्रि व नववर्ष पर यहाँ   श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। 

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