शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

माघ गुप्त नवरात्रि का छठा दिन है माँ कात्यायनी को समर्पित


आज माघ माह की शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि है। वर्ष में आने वाली दो गुप्त नवरात्रि में से माघ माह में आने वाली गुप्त नवरात्रि 25 जनवरी से शुरू हो चुकी है। आज 31 जनवरी को नवरात्रि का छठा दिन है। आज के दिन नवदुर्गा के छठे रूप माता कात्यायनी की उपासना की जाती है।

माता कात्यायनी की उत्पत्ति

हिन्दु शास्त्रों के अनुसार महिषासुर नामक राक्षस का वध करने के लिये देवी पार्वती ने कात्यायनी का रूप धारण किया था। ऐसी मान्यता है की कात्यायनी का रूप देवी पार्वती का सबसे आक्रमक रूप है।

शासित ग्रह -

ऐसा माना जाता है की माता कात्यायनी ब्रहस्पति ग्रह की स्वामी हैं। अतः माता कात्यायनी की आराधना करने से ब्रहस्पति ग्रह भी प्रसन्न होते हैं। 

शास्त्रों में वर्णित माता कात्यायनी का रूप

माता कात्यायनी की चार भुँजायें हैं और उन्हें सिंह की सवारी करते दर्शाया जाता है। अपने बायें हाथों में माता कात्यायनी कमल का फूल तलवार लिये हुये होती हैं जबकि माता का उपरवाला दायां हाथ अभय मुद्रा और नीचे वाला दायां हाथ वरद मुद्रा में शोभित होता है।
माँ कात्यायनी 

प्रिय पुष्प

माता कात्यायनी को लाल रँग के पुष्प विशेषतः लाल गुलाब के फूल अत्यन्त प्रिय हैं।

उपासना

ऐसा माना जाता है की माता कात्यायनी की उपासना करने से मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का स्वामी बनता है। श्री कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिये देवी रुक्मणी बृज मण्डल की गोपियों ने माता कात्यायनी की उपासना की थी। कात्यायनी देवी बृज मण्डल की अधिष्ठात्री देवी भी है। ऋषि कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण देवी पार्वती का यह रूप कात्यायनी कहलाया। माँ कात्यायनी की उपासना के लिए मन्त्र, स्तोत्रम्, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान मन्त्र, कवच एवं आरती नीचे दी जा रही हैं।
माँ कात्यायनी का बीज मन्त्र 
 देवी कात्यायन्यै नमः॥
प्रार्थना 
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥


स्तोत्रम्

कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै : : : स्वाहारूपिणी॥

कवच

कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥
आरती
जय जय अम्बे जय कात्यायनी। जय जग माता जग की महारानी॥
बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहावर दाती नाम पुकारा॥
कई नाम है कई धाम है। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥
हर मन्दिर में ज्योत तुम्हारी। कही योगेश्वरी महिमा न्यारी॥
हर जगह उत्सव होते रहते। हर मन्दिर में भगत है कहते॥
कत्यायनी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की॥
झूठे मोह से छुडाने वाली। अपना नाम जपाने वाली॥
बृहस्पतिवार को पूजा करिए। ध्यान कात्यायनी का धरिये॥
हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी॥
जो भी माँ को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें