शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

राधावल्लभ मन्दिर में भक्तजन धूमधाम से करते हैं ठाकुरजी का व्याहुला

वृन्दावन के प्रमुख मन्दिरों में से एक राधावल्लभ मन्दिर में भक्तजन अपनी मनोकामना पूर्ण हो जाने पर ठाकुर राधावल्लभ लाल का व्याहुला यानि विवाह उत्सव धूमधाम से मनाते हैं। विवाह उत्सव में ठाकुर राधावल्लभ लाल का दुल्हे की तरह शृङ्गार किया जाता है और धूमधाम के साथ वृन्दावन में बारात निकाली जाती है। व्याहुला माह में कई-कई बार होते हैं।

वृन्दावन के राधावल्लभ मन्दिर में व्याहुला के अवसर पर दूल्हे के स्वरूप में ठाकुर राधावल्लभ लाल 


व्याहुला का आयोजन करने से पहले भक्त मन्दिर के गोस्वामियों से स्वीकृति लेते हैं। मन्दिर के सेवायत गोस्वामी की स्वीकृति मिलने के बाद शुभ मुहूर्त और तिथि देखकर भक्तजन किसी पारिवारिक सदस्य  के विवाह उत्सव से भी बेहतर तरीके से पूर्ण आस्था के साथ व्याहुला की तैयारी करते हैं। ठाकुर राधावल्लभ लाल को धारण कराने के लिये  नवीन पोशाक, शृङ्गार के सामान के अलावा ठाकुरजी के भोग और बाराती के रुप में विवाह उत्सव में शामिल भक्तों के लिये भी प्रसाद की व्यवस्था की जाती है। मन्दिर की साज सज्जा की जाती है। सुगन्धित पुष्पों से मन्दिर के गर्भगृ़ह को कुञ्जनुमा मण्डप के रुप में सजाया जाता है। मन्दिर के चौक, द्वार और प्रमुख मार्ग पुष्पों और रँग-बिरँगी विद्युत झालरों से सजाया जाता है। भक्तजन ठाकुर राधावल्लभ लाल की बारात वृन्दावन में धूमधाम से निकालते हैं। वहीं राधावल्लभ मन्दिर में आयोजित व्याहुला में गोस्वामी आराध्य ठाकुर राधावल्लभ लाल को नवीन पोशाक धारण कराने के साथ ही उनका दुल्हे जैसा शृङ्गार करते हैं। ठाकुरजी को सुगन्धित पुष्पों से बना शेहरा पहनाने के साथ ही हिन्दु विवाह परम्परा के अनुसार  गठजोड़ा की रस्म भी निभायी जाती है। शाम के समय सन्ध्या आरती से शयन आरती के बीच आयोजित होने वाले व्याहुले के दौरान मन्दिर में ठाकुरजी के सामने बैठकर पारम्परिक शैली में रसिक सन्तों की वाणियों का गायन करने वाले समाजियों द्वारा व्याहुला के पदों का गायन किया जाता है। व्याहुला के दौरान समाज का पहला पद राग गौरी में गाया जाता है -

...खेलत रास दुलहिनी दूलहु।
सुनहु सखी सहित ललितादिक, निरखि-निरखि नैननि किन फूलहु।
अति कल मधुर महा मोहन धुनि, उपजत हँस सुता के कूलहु
थेई-थेई वचन मिथुन मुख निसरत, सुनि-सुनि देह दसा किन भूलहु।
मृद पदन्यास उठत कुंकुम रज,अदभुत बहत समीर दुकूलहु
कबहुं श्याम-श्याम दशनांचल, कच-कुच-हार छुबत भुज मूलहु।

व्याहुला का समाज गायन पूर्ण होने के बाद दूधभाती की परम्परा का निर्वाह किया जाता है, जिसमें विवाह उत्सव में शामिल सभी भक्तों को उत्सव में बनने वाला प्रसाद वितरित किया जाता है। प्रसाद में बेसन की बूँदी, नमकीम सेंव, चन्द्रकला, बूँदी के लड्डू, टिकरी, मठरी शामिल होते हैं। प्रसाद पाने के साथ ही भक्तजन विदा हो जाते हैं।

मन्दिर के आचार्य योगेन्द्र वल्लभ गोस्वामी ने बताया कि व्याहुला यानि ठाकुर राधावल्लभ लाल का विवाह उत्सव एक रास है, जो कि विशुद्ध निकुंजलीला है। यह मन की भावनाओं का अतिरेक है, जिसमें भक्त अपने प्रियतम और प्रिया यानि कृष्ण और राधा को राधावल्लभ के रुप में देखना चाहते हैं। व्याहुला भक्त की अपने आराध्य के प्रति भक्ति की पराकाष्ठा है। मनोकामना पूर्ण हो जाने पर भक्त ठाकुरजी का व्याहुला मनोरथ कराते हैं।

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