शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

रँगजी मन्दिर के विशाल रथ की सुरक्षा के लिये रथ पर विराजित हैं देवता

वर्ष में एक दिन चैत्र कृष्ण पक्ष नवमी के दिन रथ पर विराजते हैं भगवान गोदारँगमन्नार


वृन्दावन के दक्षिण भारतीय शैली के रँगजी मन्दिर के दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव में एक दिन भगवान गोदारँगमन्नार को विराजित कर चलने वाला विशाल रथ किसी मन्दिर से कम नहीं है। 50 फुट ऊँचे रथ पर भगवान श्री गोदारँगमन्नार वर्ष में एक बार विराजमान होकर रँगजी मन्दिर से बड़ा बगीचा जाते हैं। लगभग 170 वर्ष पुराने मन्दिर के रथ में भक्तों को अपने आराध्य श्री गोदारँगमन्नार के दर्शन ब्रह्मोत्सव के दौरान होते हैं। मन्दिर के इस विशाल रथ के कारण मन्दिर में वर्ष में एक बार होने वाले ब्रह्मोत्सव को भक्तजन रथ का मेला के नाम से भी जानते हैं। भगवान के इस रथ की सुरक्षा रथ पर ही विराजित देवता करते हैं

रँगजी मन्दिर के कलात्मक विशाल रथ के निर्माण के बारे में जानकारों का कहना है कि इसके निर्माण के लिये मैसूर से चन्दन की लकड़ी और हिमाचल से सागवान की लकड़ी लायी गयी थी। राजस्थान के कारीगरों द्वारा रथ तैयार किया गया था। वास्तुकला का सम्यक ध्यान रखते हुये बने  इस रथ में शिखर से लेकर आसन तक देवताओं की लकड़ी की मूर्तियां बनीं हैं। रथ में भगवान के विराजमान होने को बनी चौबारी के द्वारों के दोनों तरफ द्वारपाल जय और विजय खड़े हैं। रथ के चारों कोनों पर बाहर की ओर बुरी नजर से बचाने के लिये सिंह और शार्दूल विराजित हैं। रथ की चोटी पर हनुमानजी विराजित हैं। रथ के 4 घोड़ों की लगाम विराजित सारथी के हाथों में है।

रँग जी मन्दिर में विराजित विशाल रथ 


रथ यात्रा के दौरान हजारों भक्त विशाल रथ को बड़े-बड़े रस्सों से पकड़ कर खींचते हैं। लकड़ी के लगभग 5 फुट व्यास वाले चार पहियों पर चलने वाले इस रथ के संचालन के लिये मानवीय तकनीक का प्रयोग किया गया है। रथ को रोकने के लिये मन्दिर के सेवकजन लकड़ी के बने गुटकाओं को लेकर रथ के साथ-साथ चलते हैं। रथ को रोकने के लिये वह लकड़ी के बड़े गुटके नुमा बनी ब्रेक को रथ के पहिया के नीचे लगा देते हैं।

ब्रह्मोत्सव के दौरान रथ की चोटी पर स्वर्ण कलश लगाया जाता है। यात्रा के लिये सजधज कर तैयार रथ लगभग 60 फुट ऊँचा हो जाता है। मन्दिर प्रबन्धन द्वारा विशाल रथ का रखरखाव खास तौर से किया जाता है। रथ को सुरक्षित रखने के लिये मन्दिर के द्वार के बायीं ओर विशाल रथ घर बना है, जिसमें रथ वर्षभर खड़ा रहता है। मन्दिर प्रबन्धन श्रद्धालुओं को भगवान श्री गोदारँगमन्नार के रथ को देखने के लिये रथघर को वर्षभर खुला रखता है रथ के दर्शन के लिये मन्दिर प्रबन्धन द्वारा टिकट काउंटर की व्यवस्था की गयी है।

रँगजी मन्दिर से जुड़े आचार्य चक्रपाणि ने बताया कि लगभग 170 वर्ष पूर्व मथुरा के सेठ श्री लक्ष्मीचन्द, श्री राधाकृष्ण और गोविंददास ने मन्दिर का निर्माण कराया था। मन्दिर निर्माण के बाद से प्रतिवर्ष ब्रह्मोत्सव मनाया जाता है। इस ब्रह्मोत्सव के दौरान चैत्र कृष्ण पक्ष कि नवमी के दिन विशाल रथ को सजाया जाता है। इस रथ पर भगवान श्री गोदारँगमन्नार विराजमान होकर मन्दिर के ही बड़े बगीचा पधारते हैं।

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