सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

राधामाधव दिव्य देश मन्दिर में धार्मिक आयोजनों के मध्य शुरू हुआ ब्रह्मोत्सव

वृन्दावन स्थित चैतन्य विहार में श्री राधामाधव दिव्य देश मन्दिर में छह दिवसीय चतुर्दश ब्रह्मोत्सव का शुभारम्भ हुआ ब्रह्मोत्सव का शुभारम्भ दक्षिण भारत से आये विद्वान आचार्यों ने स्वामी अनन्ताचार्यजी महाराज के सान्निध्य में किया। शाम से शुरू हुये धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में भक्तजन शामिल हुये।

ब्रह्मोत्सव के अवसर पर रौशनी से झिलमिलाता राधामाधव दिव्य देश मन्दिर 


रविवार देर शाम को कृष्ण भक्ति प्रचार संघ द्वारा आयोजित ब्रह्मोत्सवके पहले दिन आचार्यों ने मन्दिर के गर्भ गृह में विराजित भगवान  राधामाधव का पञ्चामृत दूध, दही, घृत, शहद, शक्कर से अभिषेक किया। इसके पश्चात् वेद मंत्रोच्चारों के मध्य भगवान राधामाधव की सवारी निकलने के पहले श्री विश्वक्सेन का पूजन किया गया। 
मन्दिर के आचार्य ब्रह्मोत्सव की तैयारी करते हुये 


ब्रह्मोत्सव में दक्षिण भारतीय वाद्ययन्त्र बजाते कलाकार 


राधामाधव दिव्य देश मन्दिर में विश्वक्सेन पूजन के दौरान विप्र बटुक


आचार्यों ने रात तक देवताओं का आवाहन किया। इसके पश्चात् अंकुरारोपण की धर्म परम्परा का निर्वाह किया गया। श्वेत और पीले रँग के वस्त्र धारण किये आचार्यों ने भगवान राधामाधव के चल श्रीविग्रहों को पुष्पों से सजी पालकी में विराजमान किया। आचार्यों ने मन्त्रोच्चारों के मध्य मन्दिर परिसर में पालकी को भ्रमण कराया। सवारी में सर्वप्रथम पालकी में भगवान राधामाधव विराजमान थे। इनके पीछे विप्र टुक पीले रँग के वस्त्र धारण किये हुये नारायण स्तोत्र का वाचन करते हुये चल रहे थे। दक्षिण भारत से आये  लगभग 100 से अधिक आचार्य स्तुति कर रहे थे। इस बीच जगह-जगह कर्पूर और दीपों से भगवान की आरती की गयी मन्दिर परिसर में भ्रमण करते हुये भगवान की पालकी गोपुरम द्वार से होते हुये मन्दिर के गर्भ गृह पहुंची। इस दौरान  मन्दिर परिसर भक्तिमय हो गया। भक्तजन  भगवान के जयकारे लगाने लगे। घण्टे और मन्जिरों की धुनों के मध्य भक्तजन भगवान की एक झलक पाने के लिये आतुर दिखे।

मन्दिर के प्रबन्धक देवराज तिवारी ने बताया कि ब्रहोत्सव में दिन की शुरुआत प्रात: मंगलाशासन यानि भगवान की विशेष प्रार्थना से की जाती है। मन्दिर के सभी आचार्य एवं विप्र बटुक भगवान के मंगलाशासन का सस्वर गायन करते हैं। इसके पश्चात् ही धार्मिक कार्यक्रम प्रारम्भ किये जाते हैं। भक्तों द्वारा अपने प्रिय आराध्य का मंगलाशासन श्री वैष्णव सम्प्रदाय की विशेष देन है। श्री सम्प्रदाय में श्री मंगलाशासन का विशेष महत्व है। श्री आल्वारों यानि भगवान के अनन्य सेवक आचार्य की श्रीसूक्तियों का प्रारम्भ  ही श्रीविष्णुचित स्वामीजी के मंगलाशासनात्मक प्रबन्ध से होता है। मंगलाशासन सभी दिव्य देश मन्दिरों में प्रमुखता से होता है। मंगलाशासन का पाठ भक्तों को नित्य करना चाहिये, इसके पश्चात् दिन के कार्यों की शुरुआत करने से सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

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