गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

गोपेश्वर महादेव मन्दिर, वृन्दावन

वृन्दावन में वंशीवट क्षेत्र में स्थित प्राचीन गोपेश्वर मन्दिर बृज मण्डल के चार प्रमुख शिव मन्दिरों में से एक हैं। मन्दिर में विराजित शिव लिङ्ग लगभग 4750 वर्ष पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ द्वारा स्थापित किया गया। तभी से इस प्राचीन मन्दिर में प्रात: के समय महादेव का अभिषेक और पूजन होता है और शाम के समय भगवान शिव का गोपी रूप में शृङ्गार किया जाता है।

मन्दिर के सेवायत राम गोपाल गोस्वामी ने बताया की भगवान कृष्ण के नित्य गौलोक धाम में चले जाने के पश्चात् लगभग 125 वर्ष बाद उनके प्रपौत्र बज्रनाभ ने शाडिल्य ऋषि के मार्गदर्शन में बृज के घने जङ्गलों में चार शिव लिङ्ग खोजे थे। इन शिव लिङ्गों में गोपेश्वर, भूतेश्वर, चकलेश्वर और कामेश्वर हैं। बज्रनाभ ने वृन्दावन में गोपेश्वर, मथुरा में भूतेश्वर, कामवन यानि राजस्थान के कांमा में कामेश्वर और गोवर्धन में चकलेश्वर शिव लिङ्ग  पुन: स्थापित किये थे।

गोपेश्वर महादेव मन्दिर, वृन्दावन 


गोपेश्वर महादेव के महत्व के बारे में राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृन्दावन दास ने अपने पदबन्ध में लिखा है की बिना गोपेश्वर महादेव के दर्शन किये किसी की भी यात्रा सफल नहीं हो सकती।

नमो नमो जु भक्ति रिझवार।
नाम विदित गोपेश्वर जिनकौ,
ते वृन्दा कानन कुतुवार।
यात्रा सुफल होत बस जबही,
जो रज वन्दै इन दरवार।
वृन्दावन हित रूप सखी वपु,
सेवत दम्पत्ति नित्य विहार॥

मन्दिर की सेवायत डॉ.मीनाक्षी गोस्वामी ने बताया कि गोपेश्वर महादेव मन्दिर का उल्लेख धार्मिक ग्रन्थों गर्ग संहिता और श्रीमद भागवत महापुराण में भी किया गया है।

गर्ग संहिता के वृत्त 22 खण्ड 29 और अध्याय 32 में वर्णित है -

यथास्तुचोक्त वा भगवान् वृन्दावरण्ये मनोहरे।
कालिन्दी निकटे रास रासमण्डल मण्डिते॥
निकुन्ज पार्श्वे पुलिन, वंशीवट समीपत:
शिवोपिचासुरि मुनिर्नित्यं वासं चकारह॥

भागवत पुराण - स्कन्द महात्म्य 2/4/5 -

वज्रस्तु तत्साहाय्येन शाण्डिल्याप्यनुग्रहात्
गोविन्द गोपगोपीनां लीलास्थानान्यनुक्रमात्।
विज्ञायाभिधयास्थाप्य ग्रामानावासयद्वहून
कुण्ड कूपादि पूर्ते शिवादिस्थापनेन च॥

गोपेश्वर मन्दिर का इतिहास व मान्यतायें -


बृज में गोपेश्वर महादेव के बारे में बताया जाता है की द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने राधारानी और गोपियों के साथ वृन्दावन के यमुना तट पर महारास किया था। दिव्य महारास में किसी भी पुरुष का प्रवेश वर्जित था। महारास के दौरान जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव ने श्री कृष्ण की मुरली की तान सुनी तो उन्हें भी बृज में जाकर महारास देखने की इच्छा हुयी। जब जटाधारी भगवान शिव महारास स्थल में प्रवेश करने लगे तो उन्हें बृज की गोपियों ने बाहर ही रोक दिया जबकि देवी पार्वती को प्रवेश मिल गया। जब महादेव ने गोपियों से भगवान के महारास देखने की इच्छा के बारे में बताया और विनती की तो गोपियों ने यमुना महारानी की सहायता लेने का मार्ग दिखाया। भगवान शिव ने यमुना स्नान किया। यमुना महारानी ने भगवान शिव को महिलाओं के वस्त्र धारण करने के लिये दिये और उनका शृङ्गार किया। भगवान शिव गोपी रूप धारण कर महारास में शामिल हुये। लेकिन महारास के समय भगवान कृष्ण के वंशी बजाने पर भगवान शिव गोपियों की तरह नृत्य करना भूल गये और वंशी की तान में सुधबुध खोकर वह अपनी शैली में नृत्य करने लगे। तभी राधारानी ने उन्हें महादेव के रूप में पहचान लिया। गोपी रूप में महादेव को देखकर राधारानी रूठकर मानसरोवर चली गयी। भगवान कृष्ण राधारानी को मान सरोवर से मनाकर लाये और बताया की महादेव महारास देखने के लिये कैलाश पर्वत से बृज मण्डल आये थे। तभी से भगवान शिव का नाम गोपेश्वर महादेव हो गया और वह गोपेश्वर भगवान के नाम से वृन्दावन में ही विराजित हो गये। तभी से वृन्दावन के गोपेश्वर मन्दिर में भगवान शिव का प्रातः अभिषेक व सन्ध्या में गोपी रूप में शृङ्गार किया जाता है।

गोपेश्वर महादेव का गोपी रूप में शृङ्गार 

गोपेश्वर महादेव का गोपी रूप में शृङ्गार 


गोपेश्वर महादेव मन्दिर में विराजित अकेले शिव लिङ्ग को लेकर या भी मान्यता है कि देवी पार्वती महादेव को छोड़कर भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय को लेकर महारास में भाग लेने के लिये वृन्दावन चली गई थीं। इसीलिये आज भी गोपेश्वर मन्दिर के गर्भगृह में अकेले भगवान गोपेश्वर विराजमान हैं, जबकि देवी पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय गर्भगृह से बाहर ही विराजमान है। बृज के प्रतिष्ठित गोपेश्वर महादेव मन्दिर में सिर्फ बृज के शिव भक्त दर्शन करने के लिये आते हैं बल्कि भारत के अन्य क्षेत्रों और विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं।


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