सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

मथुरा का प्राचीन दीर्घ विष्णु मन्दिर

तीर्थ नगरी मथुरा के प्राचीन मन्दिरों में से एक दीर्घ विष्णु मन्दिर भगवान विष्णु के दीर्घ स्वरुप को समर्पित एक अति प्राचीन देवस्थान है जो युगपर्यन्त सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास का साक्षी रहा है। मन्दिर के सेवायत कान्तानाथ चतुर्वेदी ने द्रिक पञ्चांग से मन्दिर के अध्यात्मिक व ऐतिहासिक महत्व से जुड़े अनेक तथ्यों को साझा किया। उन्होंने आगे बताया की विष्णु भगवान जब चार भुजाओं के साथ प्रकट होते हैं और प्रत्येक भुजा में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये होते हैं, भगवान विष्णु का वही रूप दीर्घ विष्णु कहलाता है।

मन्दिर में विराजित दीर्घ विष्णु व देवी लक्ष्मी 


मन्दिर की स्थापना व इतिहास


हालाँकि यह मन्दिर अति प्राचीन है, लेकिन मन्दिर में भगवान विष्णु के विग्रह स्थापना और मन्दिर निर्माण की तिथि को लेकर शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख नहीं हैं। मान्यता है की मथुरा के घीया मण्डी क्षेत्र में टीले पर हवेलीनुमा बने दीर्घ विष्णु मन्दिर में विराजित भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का विग्रह सतयुग काल में स्वयं प्रकट हुआ था। दीर्घ विष्णु मन्दिर को प्रकाश में लाने का कार्य आज से लगभग 4500 वर्ष पहले  भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने गर्गाचार्य ऋषि के मार्गदर्शन में किया था। हिन्दु धार्मिक ग्रन्थ जैसे वराह पुराण, गर्ग संहिता, नारद पुराण और श्रीमद भागवत में भी दीर्घ विष्णु मन्दिर का उल्लेख किया गया है, इन धर्म पुराणों में यमुना के तट के विष्णु घाट पर मन्दिर के होने का प्रमाण मिलता है।

ऐसा माना जाता है की, मुगल कालखण्ड में औरंगज़ेब से अहमद शाह अब्दाली तक के शासन काल में शाही सेना ने 8 बार मन्दिर को क्षति पहुंचायी। इसके बाद लगभग 1865 में बनारस के राजा पटनीमल ने मथुरा आकर दीर्घ विष्णु मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया। कई बार हुये जीर्णोद्धार के परिणामतः प्राचीन दीर्घ विष्णु मन्दिर के बाहरी और आन्तरिक मूल स्वरुप में काफी बदलाव हुये हैं 

मन्दिर के गर्भ गृह के मुख्य द्वार के ऊपर लगे शिला लेख में बनारस के राजा पटनीमल द्वारा दीर्घ विष्णु मन्दिर के जीर्णोद्धार कराने का उल्लेख है। शिला में पाण्डु लिपि में राजा द्वारा मन्दिर के जीर्णोद्धार की बात लिखी गयी है। उसी कालखण्ड में वृन्दावन के प्राचीन राधारमण मन्दिर के निकट राजा पटनीमल ने एक कुञ्ज का निर्माण भी कराया था, जिसमें आज भी भक्तजन रह रहे हैं। मथुरा में इस कुञ्ज को लोग पटनी वाली कुञ्ज के नाम से जानते हैं।


मन्दिर का वास्तुशिल्प


इस प्राचीन मन्दिर की हवेलीनुमा इमारत के 2 प्राचीन द्वारों के बाद संगमरमर से बना एक चौक है। पूर्वी द्वार के ठीक सामने मन्दिर के चौक के बाद ऊंचे बरामदे के आगे गर्भ गृह बना है, जिसमें भगवान दीर्घ विष्णु की आदमकद मूर्ति स्थापित है। भगवान विष्णु गर्भ गृह में विराट स्वरूप में विराजित हैं। भगवान दीर्घ विष्णु अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुये हैं। दीर्घ विष्णु के विग्रह के बायीं ओर नीचे की ओर देवी लक्ष्मी का विग्रह विराजित है। सामान्य तौर पर देवी लक्ष्मी कमल पुष्प पर विराजित होती हैं। जबकि प्राचीन दीर्घ विष्णु मन्दिर में कमल पुष्प के नीचे विराजित हैं।

शिलालेख जिस पर मन्दिर के जीर्णोद्धार का वर्ष व कराने वाले का नाम अंकित है
दीर्घ विष्णु मन्दिर का प्रमुख द्वार 

विभिन्न युगों में भगवान विष्णु के दीर्घ स्वरुप


हिन्दु धर्म में मान्यता है की जब-जब पृथ्वी पर पाप बढ़ता है तब-तब भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतार लेते हैं तथा दीर्घ स्वरुप धारण कर पापियों का नाश करते हैं।

सतयुग में जब राक्षस हिरण्याक्ष भूदेवी अर्थात् पृथ्वी को सागर में लेकर छुप गया था, तब भगवन विष्णु ने 64 योजन वराह अवतार धारण कर भूदेवी की रक्षा की थी। भगवान विष्णु के दशावतार में से वराह अवतार भगवान विष्णु का तीसरा अवतार है।

त्रेता युग में भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था व देवलोक पर असुरराज बलि के स्वामित्व को खत्म कर उसे पुनः इन्द्र को लौटाया था। यद्यपि वामन अवतार भगवान विष्णु का बौना स्वरुप था लेकिन लेकिन अपने कदमों से सम्पूर्ण ब्राह्मण को नापने के लिये भगवान विष्णु ने दीर्घ स्वरुप धारण किया था।      

द्वापर युग में भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के दीर्घ स्वरूप धारण करने की कथा चर्चित है। कथा के अनुसार द्वापर युग के अन्त में भगवान कृष्ण जब गोकुल से कंस के आमंत्रण पर रँग भूमि के लिये रहे थे तो भगवान कृष्ण के सखा और ग्वाल बाल ने कृष्ण से कहा कि तुम छोटे से बालकृष्ण होकर कंस का वध कैसे करोगे। कृष्ण द्वारा बलशाली कंस का मुकाबला करने को लेकर सखा और ग्वाल बाल में सन्देह था। इसी सन्देह के कारण श्री कृष्ण का कोई भी सखा और ग्वाल बाल उनके साथ गोकुल से मथुरा आने को तैयार नहीं हुआ। भगवान कृष्ण ने अपने बाल सखाओं के सन्देह को दूर करने के लिये विराट रूप धारण कर उन्हें दर्शन दिये। अन्ततः अपने विराट स्वरूप में दर्शन देने और सभी के सन्देह को दूर करने के पश्चात् भगवान श्री कृष्ण अपने सखा और ग्वाल बाल के साथ कंस से युद्ध करने के लिए मथुरा आये थे।

द्वापर युग में ही भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता के उपदेश देने के उपरान्त अपने विराट स्वरुप में दर्शन दिये थे


मन्दिर में होने वाले महोत्सव


मन्दिर के सेवायत कान्तानाथ चतुर्वेदी ने बताया कि दीर्घ विष्णु मन्दिर का पाटोत्सव यानि भगवान दीर्घ विष्णु का विग्रह स्थापना दिवस वैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी को मनाया जाता है। उन्होंने बताया की विष्णु स्वामी मतानुयायी सम्प्रदाय के अनुसार मन्दिर में विराजित दीर्घ विष्णु भगवान की पूजा सेवा पद्दति से की जा रही है। मन्दिर में बृज की भाव लीला और सनातन वैष्णव परम्पराओं के अनुसार उत्सव मनाये जाते हैं। 



                 सेवायत गोस्वामी मन्दिर के बारे में जानकारी साझा करते हुये 


मन्दिर की मान्यता


इस मन्दिर को लेकर भक्तों में मान्यता है कि जो भी कन्या इस मन्दिर में गुरुवार के दिन दीर्घ विष्णु का दर्शन और पूजन करेगी, उस कन्या को सुन्दर वर और सन्तान सुख की प्राप्ति होगी


मन्दिर के दर्शनों का समय  


प्रात: - 7:00 से 11:30 बजे तक
संध्या - 4:00 से 8:00 बजे तक
मंगला आरती - प्रात: 7:00 बजे
शयन आरती - संध्या 7:00 बजे



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