सोमवार, 2 मार्च 2020

वृन्दावन के प्राचीन सप्त देवालयों में से एक राधादामोदर मन्दिर

वृन्दावन के प्राचीन सप्त देवालयों में से एक राधादामोदर मन्दिर में विराजित जन-जन के आराध्य ठाकुर राधादामोदर के विग्रह लगभग 478 साल पुराने हैं। मन्दिर में विराजित ठाकुरजी के विग्रह श्रील जीव गोस्वामी द्वारा सेवित हैं। श्री ल रूप गोस्वामी पाद ने अपने मन्त्र दीक्षित शिष्य श्री ल जीव गोस्वामी को भगवान राधादामोदर के विग्रह को दिव्य श्याम रँग के शिलाखण्ड से तैयार कर सम्वत 1599 यानि सन 1542 ईसवी माघ शुक्ल दशमी तिथि के दिन सेवा के लिए प्रदान किया था। इस प्राचीन राधादामोदर मन्दिर के गर्भगृह में विराजित ठाकुरजी के दर्शन न सिर्फ देशवासी बल्कि विदेशी भक्त भी कर रहे हैं। 

आराध्य ठाकुर राधादामोदर

बृज में मुगल शासक औरंगजेब द्वारा मन्दिरों को तोड़ने के दौरान सुरक्षा की दृष्टि से वृन्दावन के प्राचीन सप्त देवालयों में शामिल गोविन्ददेव मन्दिर के ठाकुरजी के जयपुर चले जाने के बाद गोस्वामी नवललाल महाराज भी ठाकुर राधादामोदर को लेकर जयपुर चले गये। वृन्दावन में जीव गोस्वामी से सेवा लेकर ठाकुर राधादामोदर जयपुर स्थित प्रभु भक्त हिम्मत राव नाजिर जो कि नि:सन्तान थे, उनकी पुरानी हवेली में विराजित किये गये। राजा जगत सिंह के शासनकाल में सन 1803-1818 ईसवीं में लगभग 15 वर्ष बाद पुन: प्रभु राधादामोदर वृन्दावन लौट आये। जयपुर से वृन्दावन स्थित अपने निज मन्दिर में ठाकुरजी के आ जाने के बाद ज्येष्ठ शुक्ल नवमी सम्वत् 1878 में जयपुर स्थित हिम्मत राव नाजिर के मकान में पुन: राधादामोदर के प्रतिमान विग्रह स्थापित हुये।

राधादामोदर मन्दिर के गर्भगृह में यह देव भी हैं विराजित
मन्दिर के गर्भगृह में ठाकुर राधादामोदर महाराज के साथ सिंहासन पर ललिता सखी, सन्त कृष्णदास कविराज द्वारा सेवित ठाकुर राधावृन्दावनचन्द्र, श्री ल जयदेव गोस्वामी द्वारा सेवित ठाकुर राधामाधव, श्री ल भूगर्भ गोस्वामी द्वारा सेवित ठाकुर छैलचिकन, भगवान कृष्ण द्वारा श्री ल सनातन गोस्वामी को प्रदत्त गिरिराज चरणशिला, आचार्य निर्मलचन्द्र गोस्वामी द्वारा सेवित ठाकुर जगन्नाथजी, आचार्य गोराचाँद गोस्वामी द्वारा सेवित गौरनिताई महाराज विराजित हैं।

मन्दिर में विराजमान गिरिराज शिला
राधादामोदर मन्दिर में एक प्रतिष्ठित गिरिराज शिला स्थापित है। इस पर भगवान कृष्ण के चरणचिह्न, गोमाता का खुर और वंशी और गाय चराने की लकुटी यानि लाठी का निशान अंकित हैं। इस गिरिराज शिला के बारे में कहा जाता है कि श्री ल सनातन गोस्वामी वृन्दावन से गोवर्धन गिरिराज महाराज की परिक्रमा करने के लिए प्रतिदिन जाते थे और परिक्रमा कर वृन्दावन आने पर ही वह जल ग्रहण करते थे। वृद्धावस्था में भी गोस्वामी महाराज का नियम बना रहा। वृद्धावस्था में भी गोस्वामीजी की ठाकुरजी के प्रति निष्ठा और परिक्रमा करने का दृढ़ नियम को देखकर गोवर्धन में भगवान कृष्ण ने सनातन गोस्वामी को दर्शन दिये और एक गिरिराज शिला देकर कहा कि दामोदर मन्दिर में विराजित कर इस शिला की चार परिक्रमा करने से गोवर्धन की एक परिक्रमा का फल प्राप्त होगा। वही सनातन गोस्वामी को प्रदत्त गिरिराज शिला मन्दिर में विद्यमान है। तभी से ठाकुर राधादामोदर मन्दिर की 4 परिक्रमा करने की परम्परा की शुरुआत हुयी। 

                                       श्री ल जीव गोस्वामी का समाधि स्थल
श्री ल रुप गोस्वामी ने श्री ल जीव गोस्वामी को दी मन्त्र दीक्षा
श्रीपाद जीव गोस्वामी 20 वर्ष की अवस्था में पश्चिम बंगाल से वृन्दावन आये। वृन्दावन आने से पहले उन्होने काशी में कुछ वर्ष संस्कृत के विद्वान सार्वभौम भट़्टाचार्य के शिष्य वाचस्पति द्विवेदी के पास रहकर श्रीमद भागवत, संस्कृत, व्याकरण, वेद, उपनिषद की शिक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात वृन्दावन में आकर जीव गोस्वामी ने श्री ल रुप गोस्वामी के मार्गदर्शन में ठाकुर सेवा, भक्ति, प्रभु अनुराग सेवा प्रारम्भ की और श्री ल रुप गोस्वामी के लेखन कार्य में भी सहयोग किया। श्री ल जीव गोस्वामी की सेवा से प्रभावित होकर श्री ल रुप गोस्वामी ने उन्हें मन्त्र दीक्षा दी।

ठाकुर राधादामोदर का प्राकट्य
राधादामोदर मन्दिर के कृष्णबलराम गोस्वामी ने बताया कि श्री ल जीव गोस्वामी ने देखा कि उनके गुरु श्री ल रुप गोस्वामी ठाकुर गोविन्ददेव महाराज की सेवा में भावविभोर हो जाते हैं और वह अपने ठाकुर गोविन्ददेव से बातें भी करते हैं। उन्हें ठाकुरजी को सजाने, भोग, राग सेवा करने में दिन-रात का भी पता नहीं रहता है। अपने गुरु को इस तरह ठाकुरजी की सेवा करते देखकर श्री ल जीव गोस्वामी के मन में यह विचार आया कि उनके द्वारा भी एक सेवित ठाकुर विग्रह हों तो वह भी अपने ठाकुरजी का शृङ्गार करें, अपने हाथों से भोग लगायें और उन्हें निहारें। तभी जीव गोस्वामी की मनोकामना पूर्ण करने के लिए ठाकुर राधादामोदर महाराज ने उनके गुरु श्री ल रुप गोस्वामी को रात में स्वप्न में आदेश दिया कि वह अपने प्रिय शिष्य के लिए दामोदर स्वरुप को प्रकट करें और उस प्रकट दामोदर स्वरुप विग्रह को नित्य सेवा के लिए जीव गोस्वामी को दें। तभी एक दिन जब श्री ल रुप गोस्वामी प्रात: जागकर यमुना स्नान करके मन्दिर के लिए लौट रहे थे तब उन्हें रास्ते में श्याम रँग का शिलाखण्ड प्राप्त हुआ उस शिलाखण्ड को वह अपनी कुटीर में ले गये। उस शिलाखण्ड से श्री ल  रूप गोस्वामी ने भगवान कृष्ण का दामोदर स्वरुप बनाया। ठाकुर राधादामोदर के विग्रह को श्री ल रुप गोस्वामी ने  लगभग सन 1542 ईसवी में माघ शुक्ल दशमी को अपने शिष्य श्री ल जीव गोस्वामी को नित्य सेवा के लिए प्रदान किया। तभी से ठाकुर राधादामोदर महाराज का प्राकट्योत्सव मंन्दिर के गोस्वामीजन माघ शुक्ल दशमी को मनाते आ रहे हैं। भक्ति रत्नाकर ग्रन्थ में ठाकुर राधादामोदर महाराज के प्राकट्य का उल्लेख है।

श्री ल रूप गोस्वामी की भजनकुटीर

मन्दिर परिसर में इन सन्तों और वैष्णवजनों की समाधियां हैं
श्री ल रुप गोस्वामी, श्री ल जीव गोस्वामी, श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी, श्री ल भूगर्भ गोस्वामी की मूल समाधियां सहित गीत गोविन्द के रचियता श्री जयदेव गोस्वामी की पुष्प समाधि, आचार्य श्री ल गोराचाँद गोस्वामी, श्री ल भक्ति सिद्धान्त सरस्वती और अनेक वैष्णवजनों की समाधियां हैं।

भजन कुटी में श्री ल ए.सी.भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद

मन्दिर में सुरक्षित है स्वामी प्रभुपाद की भजन कुटी और रसोई
राधादामोदर मन्दिर में इस्कॉन के संस्थापक श्री ल ए.सी.भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद की भजन कुटी और रसोईघर स्थित है। प्रभुपाद ने मन्दिर में रहकर भजन किया और श्रीमद भागवत ग्रन्थ के साथ-साथ अन्य ग्रन्थों का अँग्रेजी भाषा में अनुवाद किया था। ठाकुर राधादामोदर मन्दिर से श्री ल प्रभुपाद हरिनाम का प्रचार प्रसार करने लिए देश विदेश गये। राधादामोदर मन्दिर के कृष्णबलराम गोस्वामी ने बताया कि श्री ल प्रभुपाद अपनी भजन स्थली के प्रति अनेक अच्छी भावनायें रखते थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि राधादामोदर मन्दिर में निरन्तर हरिनाम संकीर्तन और सत्संग चलता रहे। प्रभुपाद के मन की यह इच्छा उनके लिखे पत्रों में भी देखी जा सकती है। इन्ही आध्यात्मिक भावनाओं के आधार पर ही श्री ल प्रभुपाद ने इस्कॉन की नींव रखी। मन्दिर के गोस्वामियों ने श्री ल प्रभुपाद की कुटी और रसोई आज भी संरक्षित है। आज भी मन्दिर के गोस्वामियों द्वारा प्रभुपाद की सेवा और उनकी रसोई में प्रसाद बनाकर उन्हें प्रस्तुत किया जाता है।

मन्दिर में होने वाली नित्य सेवायें
मङ्गला भोग सेवा, बाल भोग सेवा,राजभोग सेवा, संध्या बाल भोग सेवा, शयन भोग सेवा, पोशाक सेवा, मुकुट सेवा, छप्पन भोग सेवा, रसोई सेवा, गिरिराज चरण शिला अभिषेक सेवा, हरिनाम संकीर्तन सेवा, मन्दिर में स्थित श्यामा गौशाला में गौमाताओं की सेवा।

34 दिवसीय कार्तिक मास में होने वाली सेवायें
दीपदान सेवा, सप्त आरती सेवा, ठाकुरजी को माखन मिश्री भोग की सेवा, अगरबत्ती, धूप सेवा, इत्र सेवा।

मन्दिर में प्रभु दर्शन का समय

सर्दियों में दर्शन का समय
प्रात: 5:00 से 5:15 तक मङ्गला आरती दर्शन
प्रात: 7:00 से 11:30 बजे तक
मध्यान 12:30 से 1:00 बजे तक
संध्या 4 :00 से 8:00 बजे तक
रात्रि 9:00 से 9:15 बजे तक शयन आरती

गर्मियों में दर्शन का समय
प्रात: 4:30 से 4.45 बजे तक मङ्गला आरती दर्शन
प्रात: 7:00  से 11:00 बजे तक
मध्यान 12:00 से 12:30 बजे तक
संध्या 5:00 से 8:30 बजे तक
रात्रि 9:30 से 9:45 बके तक शयन आरती


कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें