मंगलवार, 3 मार्च 2020

वृन्दावन के प्राचीन सप्तदेवालयों में से एक राधागोकुलानन्द मन्दिर

विश्व पटल पर आस्था का केन्द्र वृन्दावन के प्राचीन सप्त देवालयों में से एक राधागोकुलानन्द मन्दिर से स्थानीय भक्तों के साथ-साथ देश के पूर्वोत्तर राज्यों और विदेशी भक्तों की भी आस्था जुड़ी हैं। आधुनिक रँग में रँग रहे बृज के मन्दिरों के मध्य लगभग 500 साल पुराना राधागोकुलानन्द मन्दिर वर्तमान में भी अपने प्राचीन स्वरूप में स्थित है। 

                            श्री राधागोकुलानन्द मन्दिर में विराजमान श्री विग्रह
राधागोकुलानन्द मन्दिर के आचार्य श्री वत्स गोस्वामी ने बताया कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृन्दावन आगमन से पूर्व अपने सहयोगी लोकनाथ गोस्वामी और भूगर्भ गोस्वामी को वृन्दावन आने की प्रेरणा दी। उसी के अन्तर्गत श्री लोकनाथ गोस्वामी पाद बृज में आये, उस समय वृन्दावन भौगोलिक रूप से जाग्रत नहीं था। इसलिये छाता क्षेत्र के निकट उमरावा नामक स्थान पर किशोरी कुण्ड के किनारे उन्होंने तपस्या और भजन करना प्रारम्भ किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर लगभग विक्रम संवत 1567 में ठाकुर राधाविनोदी लाल महाराज प्रकट हुये। 

श्री लोकनाथ गोस्वामी बड़े ही विरक्त भाव से ठाकुर राधाविनोद लाल की सेवा करते थे। श्री लोकनाथ गोस्वामी ठाकुरजी को अपने वक्ष स्थल पर ही एक झोली बनाकर मन्दिर रूप में उन्हें विराजमान करते थे। तभी चैतन्य महाप्रभु के वृन्दावन आने की सूचना मिलने पर श्री लोकनाथ गोस्वामी उनसे मिलने के लिए उमरावा से वृन्दावन आये, लेकिन जब तक श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन से जा चुके थे। तभी ठाकुर राधाविनोद लाल की प्रेरणा से प्रेरणा मिलने पर श्री लोकनाथ गोस्वामी वृन्दावन में ही निवास करने लगे। वर्तमान में ठाकुर राधारमण मन्दिर के उत्तर दिशा की ओर ठाकुर श्री गोकुलानन्द जी का मन्दिर है, इस मन्दिर निर्माण से पूर्व यहाँ भजन कुटी बनाकर श्री लोकनाथ गोस्वामी पाद अपने इष्टदेव श्री राधाविनोद जी के साथ रहने और भजन करने लगे। 

पूर्व उत्तर भारत से खेतड़ी के राजकुमार श्री नरोत्तमदास ठाकुर आध्यात्मिक जिज्ञासा के साथ वृन्दावन आये। वृन्दावन में गोस्वामियों से उनका मिलन हुआ। गोस्वामियों ने राजकुमार नरोत्तमदास ठाकुर को वीतरागी सन्त श्री लोकनाथ गोस्वामी के सनिध्य में आध्यात्मिक यात्रा करने का सुझाव दिया, लेकिन जब राजकुमार ने श्री लोकनाथ गोस्वामी से सानिध्य प्राप्त करने का निवेदन किया तो, उन्होंने राजकुमार को दीक्षा देने से मना कर दिया। फिर भी राजकुमार नरोत्तमदास महात्मा कबीर की परम्परा के अनुरूप श्री लोकनाथ गोस्वामी का अनुसरण करते रहे। राजकुमार नरोत्तम दास ठाकुर की निष्ठा और सेवा भाव को देखते हुये श्री लोकनाथ गोस्वामी ने उन्हें दीक्षा दी। श्री लोकनाथ गोस्वामी के बाद नरोत्तमदास ठाकुर ने श्री राधाविनोद जी की सेवा की और चैतन्य सम्प्रदाय की कीर्तन प्रणाली को स्थापित किया। खेतड़ी महोत्सव के नाम से सम्प्रदाय के सिधान्त, व्यवहार और आचरण का निर्धारण किया गया।

श्री राधागोकुलानन्द मन्दिर

लगभग विक्रम संवत 1600 में श्री लोकनाथ गोस्वामी सेवा परम्परा के श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ने बरसाना में ठाकुर गोकुलानन्द का प्राकट्य किया था। शुरुआत में वह अपने ठाकुर गोकुलानन्द को लेकर बरसाना में ही रहने लगे। कुछ समय के बाद मुगल शासक औरंगजेब के कार्यकाल में सुरक्षा की दृष्टि से श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती अपने ठाकुरजी को वृन्दावन ले आये गोकुलानन्द मन्दिर में रहने लगे। वह अपने आराध्य गोकुलानन्द के साथ राधाविनोद लाल की भी सेवा करने लगे। मुगल शासन में बृज में बढ़ते खतरे को देखते हुये महाराजा रामसिंह आराध्य ठाकुर राधाविनोद लाल को जयपुर ले गये, जिन्हें राजा जयसिंह ने चौड़े रास्ते में त्रिपोलिया स्थान के सामने मन्दिर का निर्माण कराकर ठाकुर राधाविनोद लाल जी को विराजित किया, लेकिन वृन्दावन में ठाकुर गोकुलानन्द की सेवा श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती गोकुलानन्द मन्दिर में करते रहे। इसलिए वृन्दावन के सात प्राचीन देवालयों में राधागोकुलानन्द मन्दिर विख्यात हो गया। तभी से इस प्राचीन ठाकुर राधागोकुलानन्द मन्दिर की व्यवस्थाओं और सेवा वर्तमान में श्री वत्स गोस्वामी द्वारा की जा रही है।

मन्दिर के पट खुलने का समय 

गर्मियों में -
प्रात: 5:30 से मध्यान 12 बजे तक
संध्या 6:00 से 9:00 बजे तक 

सर्दियों में -
प्रात: 6:30 से मध्यान 1:00 बजे तक
संध्या 5:00 से 8:00 बजे तक

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