बुधवार, 4 मार्च 2020

बरसाना की लड्डू होली में जमकर बरसे लड्डू, छायी घनघोर लाल घटा

एकबार फिर नन्दगाँव से बरसाना आये पुरोहित द्वारा नन्दबाबा का सन्देश सुन बरसानावासी खुशी से झूम उठे। कान्हा के साथ होली खेलने के आमंत्रण स्वीकारने की खुशी में बरसाना की गोपियों ने जहां जमकर गुलाल बरसाया वहीं पुरोहित के साथ विश्वभर से आये भक्तों ने लड्डू बरसाये और इसी के साथ बरसाना के श्रीजी मन्दिर यानि राधारानी के मन्दिर में होने लगी लड्डू की होली। इस विश्व प्रसिद्ध होली से बरसाने में द्वापर युग की लीला फिर से जीवन्त हो गयी। हर कोई होली की मस्ती में इस कदर डूब गया कि वह अपनी सुध-बुध भूल गया।

श्री जी मन्दिर में होली के पदों का गायन करते बरसाना के पुरोहित

बरसाना के राधारानी मन्दिर जिसे बृजवासी लाड़लीजूं का मन्दिर भी कहते हैं। यहाँ शाम के 4:30 बजते ही श्रीजी मन्दिर को लाल घटा ने ढांप लिया। लड्डू होली पर ऊपर से बरसते लड्डुओं को लपकने की भक्तों में होड़ मची थी। बृजवासियों ने जब लाल गुलाल की भर-भर झोली मारी तो सारी दुनिया झूम उठी। यह लाड़लीजूं के मन्दिर में लड्डू होली का विहंगम दृश्य था।

                      बरसाना के श्रीजी मन्दिर में लाल रँग की छायी घटा के बीच बरसानावासी 

भगवान राधाकृष्ण के प्रेम के रँग में रँगने को देश-विदेश से लाखों भक्त यहाँ आये। समूचा मन्दिर रसिकों से अटा था। भक्तजन हाथ ऊपर उठाये राधे-राधे की रटना लगाये लड्डू होरी के उत्सव का भरपूर आनन्द ले रहे थे। इस बीच वह श्रीजी के दर्शन कर उन्हें गुलाल और लड्डू अर्पित कर रहे थे। नन्दगाँव से कृष्ण स्वरूप पुरोहित सज-धज कर बरसाने फाग मनाने आया। बरसाना के गोस्वामियों ने उसका बूँदी के लड्डुओं से स्वागत किया। ढप, झांझ, मृदंग के साथ समाज जुड़ी और गोस्वामी गाने लगे नन्दगाँव कौ पाड़ौ बरसाने आयो, होरी कौ पकवान, भर भर झोरी खायौ... इसके बाद तो चारों ओर से लड्डू बरसे जिन्हें लूटने को असंख्य हाथ ऊपर उठे। महिलायें झोलियां फैलाये थीं। लड्डू ही नहीं, बिस्किट, टॉफी सब की बौछार हुयी। उसके बाद समूचा मन्दिर भक्ति के साथ प्रेम के लाल सरोवर में सराबोर हो गया। 


                         श्रीजी मन्दिर में लड्डू होली के दौरान लड्डू लूटते देशी- विदेशी भक्त

लड्डू होली के बीच बरसाना के गोस्वामियों और रहवासियों के मुख से बरबस एक ही बोल निकल रहे थे रँगीली होली श्यामा से चलो बरसाने में खेलेंगे..। राधारानी के आँगन में अबीर, गुलाल की फुहारों के बीच ब्रजवासियों में से एक फरिया ओढ़कर श्यामा बना तो दूजा श्याम और हिल-मिलकर झूमने लगे। इस तरह के दृश्य को देखकर सुदूर क्षेत्रों से आये भक्त भी भावनृत्य करने से रह न सके और झूमने लगे। इस अलौकिक रँग में सराबोर होकर उनका ह्रदय ऐसा हर्षाया कि कदम खुद ही थिरकने लगे। मानो बरसाने में त्रिभुवन समा गया हो।

बरसाना के गिरधारीलाल श्रौत्रिय ने बताया कि बरसाना में लड्डू, लट्ठमार होली खेलने कि परम्परा द्वापर युग की ठाकुर राधाकृष्ण की लीलायें हैं। इन देवकालीन लीलाओं को बरसाना के पुरोहित और समाज के लोग आज भी निभा रहे हैं। असल में यही बृज की पहिचान है।

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