रविवार, 8 मार्च 2020

गोकुल के यमुना तट पर छड़ीमार होली के सतरँगी रँग में डूबे बृजवासी

मुरलीधर घाट पर द्वापरयुगीन लीला का फिर हुआ अलौकिक दर्शन 

यमुना के तट पर बसे कान्हा के गोकुल में शनिवार को फाल्गुन शुक्ल द्वादशी तिथि को सुप्रसिद्ध छड़ीमार होली खेली गयी। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मध्य सजी-धजी हुरियारिनें पारम्परिक वेशभूषा में सजे ग्वाल-बाल और हुरियारों को प्रेम पगी छड़ी मार रहीं थीं। बृज की इस अनौखी होली को देखने के लिये देश-विदेश से गोकुल आये धर्म सैलानी भी बृज की होली के रँग में सराबोर हो गये। 


गोकुल में छड़ीमार होली 
प्रात: मथुरा और महावन के मध्य गोकुल में लाला कन्हैया का सुगन्धित पुष्पों से सजा डोला निकाला गया। गोकुल के नन्द भवन यानि नन्द बाबा के किले से पुष्पों से सजी पालकी यानि डोला में भगवान नवनीतप्रिय को विराजमान कर गोकुल में भ्रमण कराया। गोकुल की सकरी गलियों में भ्रमण के पश्चात नन्द भवन के पुजारी भगवान के  पुष्पों से सजे डोला को यमुना तट स्थित मुरलीधर घाट पर लाये और वहीं डोला को विश्राम दिया। नन्दभवन के पुजारियों ने डोला से भगवान नवनीतप्रिय को सिंहासन पर विराजित किया। बैंण्डबाजे, नफीरी, बड़े-बड़े ढोल की थाप की सुमधुर घ्वनि के मध्य भगवान के डोला के साथ-साथ चल रही गोकुल की हुरियारिनें और हुरियारे भी मुरलीधर घाट पर पहुंचे और फिर शुरु हो गई छड़ीमार होली। 

भगवान नवनीतप्रिय
सिर पर पगड़ी, धोती और बगलबन्दी, कुर्ता पहने हुरियारे सोलह शृङ्गार से सजी धजी लहंगा-ओढनी पहने हुरियारिनों से हँसी ठिठोली कर रहे थे। इसके जवाब में हुरियारिनें उनमें छड़ी मार रही थी। हुरियारे अपनी लकुटी यानि छोटी लाठी से अपना बचाव करने की कोशिश करते दिखायी दिये। यमुना तट पर टोलियों में हो रही छड़ीमार होली के विहंगम दृश्य को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे बालकृष्ण बृज की गोपियों की पे्रम पगी छड़ी की मार खा रहे हों और द्वापर युग में बालकृष्ण और बृजांगनाओं के बीच होली हो रही हो। हर कोई गोकुल की इस अनूठी होरी यानि होली के रँग में रचा-बसा नजर आया और बृज के रसिया और होली के गीत पर मदमस्त होकर नृत्य करने लगा। इसी बीच मुरलीघाट पर विराजमान भगवान नवनीत प्रिय जी के पट खुले। नन्द भवन के पुजारियों ने भगवान को टेसू के फूलों से बने रँग और गुलाल सेवित किया। इसके पश्चात पुजारियों ने भगवान का प्रसादी गुलाल और टेसू का रँग भक्तों पर बरसाया। होली की मस्ती के साथ ठाकुरजी के प्रसादी रँग को अपने ऊपर डलवाने के लिये हर कोई आतुर दिखा। छड़ीमार होली में रँग और गुलाल जमकर बरसा। होली का यह सिलसिला शाम 6 बजे तक निरन्तर चला। जैसे ही ठाकुर नवनीतप्रिय डोला में विराजमान होकर नन्द भवन की ओर चलने लगे वैसे ही डोला के साथ-साथ सभी गोकुलवासी भी नाचते- गाते अपने-अपने घर की ओर चल दिये। 

रासलीला का मंचन करते बृज के कलाकार
गोकुल के नटवर गोपाल कुंआ वालों ने बताया कि गोकुल की छड़ी होली द्वापर युगीन लीला है। गोकुलवासी आज भी भगवान कृष्ण को बाल रुप में ही देखते हैं और उन्हें लाला या बालकृष्ण कहकर पुकारते हैं। यहां छड़ी से होली खेलने के पीछे भाव है कि द्वापर युग में गोकुल में यमुना तट पर मैया यशोदा और गोपियों ने लाला बाल कृष्ण के साथ छड़ी मारकर होली खेली साथ ही यह भी ध्यान रखा कि कहीं लाला कन्हैया के चोट लग जाय इसलिये लाठी के स्थान पर हुरियारिनें छड़ी से होली खेलती हैं। द्वापर युग की यह लीला आज भी साकार रुप लेती है। गोकुलवासी इस पारम्परिक लीला को बड़े भाव से निर्वाह करते हैं। 



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